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रमजान माह की अहमियत

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रोजा खोलने और नमाज के बाद रहमत की दुआ मांगते रोजेदार। - फोटो : Mewat
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जरूरतमंदों के दुख दर्द और भूख प्यास का आभास कराने का नाम है रोजा
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नूंह। इस्लाम धर्म में रमजान माह की खास अहमियत है। मुसलमानों का यकीन है कि इसी महीने में पवित्र किताब कुरान शरीफ आसमान से उतारी गई थी। रोजा इस्लाम धर्म के पांच स्तंभों में से एक है। पूरी दुनिया के मुसलमान इस महीने का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हैं। रोजा जहां आपसी भाईचारे का प्रतीक है वहीं पूरे दिन भूखे प्यासे रहकर इंसान अपनी इच्छाओं पर काबू पाता है। रोजा गरीबों, यतीमों, जरूरतमंदों के दुख दर्द व भूख प्यास का आभास कराता है। रोजा की हालत में इंसान झूठ, चोरी, चुगली, धोखेबाजी, अत्याचार जैसी सामाजिक बुराइयों से बचता है।
इस्लाम के जानकार मौलाना याहया करीमी का कहना है कि रमजान का महीना सब्र व सुकून का महीना है, इस महीने में अल्लाह की खास रहमतें बरसती हैं। रमजान माह का एहतराम (पालन) करने वाले लोगों के अल्लाह पिछले सभी गुनाह माफ कर देता है। इस महीने में की गई इबादत और अच्छे कामों का सत्तर गुणा बदला पुण्य मिलता है।
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किसी का हक मारने पर भी रहती है पाबंदी
अल्लाह ने कुरान शरीफ में कई जगह रोजा रखने को जरूरी करार दिया है। अल्लाह कुरान में अपने बंदों को हुक्म देता है कि ए-इमान वालों तुम पर रोजा फर्ज किये गए हैं ताकि तुम परहेजगार बनो। इसके अलावा हदीश की किताबें तिर्मीजि, बुखरी शरीफ, मुस्लिम, इबनेमाजा, मिस्कात तथा अबु दाउद शरीफ में भी हजारों जगह बताया गया है कि रोजा बुराइयों से दूर रखता है। यह किसी का हक मारने, अमानत में ख्यानत करने से परहेज सिखाता है। रोजा बुरी बातों को सुनने, देखने, बोलने और यहां तक गलत को छूने तक से रोकता है। रोजा बेशर्मी और बेहयाई से बचाता है। रोजा से इंसान की सोच बदलती है। रोजा गंदे साहित्य पढ़ने व फि ल्में देखने से भी बचाता है यानी रोजा इंसान को भलाई करने की राह सिखाता है।
रोजे का इतिहास
अल्लाह के हुक्म से सन् 2 हिजरी से मुसलमानों पर रोजे अनिवार्य किए गए। इसका महत्व इसलिए बहुत ज्यादा है क्योंकि रमजान में शब-ए-कद्र के दौरान अल्लाह ने मुसलमानों की पवित्र किताब कुरान शरीफ भेजी थी।
सहरी, इफ्तार और तरावी
रमजान के दिनों में सहरी खाने का वक्त सूरज निकलने से करीब डेढ़ घंटे पहले का होता है। सहरी खाने के बाद रोजा शुरू हो जाता है। पूरे दिन रोजेदार कुछ भी खा-पी नहीं सकते। शाम को तय वक्त पर इफ्तार कर रोजा खोला जाता है। रात को इशा की नमाज (करीब 9 बजे) के बाद तरावी (खास इबादत) की नमाज अदा की जाती है। चांद देखने पर ही रोजे रखे जाते हैं और ईद मनाई जाती है।
बीमार लोगों को रोजा रखने की रहती है छूट
बीमार हो या बीमारी बढ़ने का डर हो तो रोजा न रखने की छूट रहती है। लेकिन, इसमें डॉक्टर की सलाह जरूरी है। यानी अगर डॉक्टर कहता है कि आपके रोजा रखने का असर बीमारी पर पड़ेगा तो रोजा न रखने की छूट है। अगर आप यात्रा पर हैं, गर्भवती महिला और जो मां अपने बच्चे को दूध पिलाती है उन्हें भी इससे छूट है। बहुत ज्यादा बूढ़े लोगों को भी इससे छूट रहती है।
दान सबसे महत्वपूर्ण
रमजान में जकात (दान) का खास महत्व है। अगर किसी के पास सालभर उसकी जरूरत से अलग साढ़े 52 तोला चांदी या उसके बराबर की नकदी या कीमती सामान है तो उसका ढाई फीसदी जकात यानी दान के रूप में गरीब या जरूरतमंद मुस्लिम को दिया जाना चाहिए। ईद पर फितरा (एक तरह का दान) हर मुसलमान को करना चाहिए। इसमें 2 किलो 45 ग्राम गेहूं की कीमत तक की रकम गरीबों में दान की जानी चाहिए।
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रोजे के मायने
रोजा को अरबी भाषा में सौम कहा जाता है। सौम का मतलब होता है रुकना, ठहरना यानी खुद पर नियंत्रण या काबू करना। यह वह महीना है जब हम भूख को शिद्दत से महसूस करते हैं और सोचते हैं कि एक गरीब इंसान भूख लगने पर कैसा महसूस करता होगा। बीमार इंसान जो दौलत होते हुए भी कुछ खा नहीं सकता, उसकी बेबसी को महसूस करते हैं।
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