लखनऊ (प्रवेंद्र गुप्ता)। नगर निगम में महिला पार्षदों के पति, बेटों और देवरों के लिए परेशानी वाली खबर है। खुद पार्षद पति या उनका प्रतिनिधि कहने वाले अब नगर निगम की प्रशासनिक बैठकों में शामिल नहीं हो सकेंगे। इस संबंध में शासन के निर्देश पर निदेशक स्थानीय निकाय अनुज झा ने लखनऊ सहित प्रदेश के सभी नगर निगमों, नगर पंचायतों व नगर पालिका परिषदों को पत्र भेजा है। पत्र में ने मानवाधिकार आयोग का हवाला देते हुए प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व प्रथा पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए हैं। नियमों का पालन न करने वालों के खिलाफ सत्यापित रिपोर्ट मिलने पर कार्रवाई की बात भी कही गई है।
अनुज झा की ओर से जारी पत्र में स्पष्ट किया गया है कि निकाय हित में नीतिगत निर्णय लेने और अधिनियम का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए निकाय के प्रशासनिक कार्यों और बैठकों में निर्वाचित महिला पार्षद ही अपने कर्तव्यों और दायित्वों का स्वतंत्र रूप से निर्वहन करें। वह अपने साथ संबंधियों या अन्य व्यक्तियों को निकाय के कार्याें में शामिल न करें। यह व्यवस्था समान रूप से पुरुष पदाधिकारियों पर भी लागू होगी। वह भी अपने स्थान पर किसी अन्य को प्रशासनिक बैठकों में नहीं भेज सकेंगे।
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आदेश न मानने वालों की जा सकती है सदस्यता
निदेशक स्थानीय निकाय ने ये भी निर्देश दिया है कि यदि कोई आदेश को नहीं मानता है। निर्वाचित प्रतिनिधि की तरह उसका संबंधी आता है तो सत्यापित तथ्यों के साथ शासन को रिपोर्ट भेजी जाए, जिससे संबंधित के खिलाफ नियमों के तहत प्रभावी अनुशासनिक कार्रवाई की जा सके। जानकारों का कहना है कि कार्रवाई में शासन निर्वाचित सदस्य की सदस्यता समाप्त कर सकता है।
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लखनऊ में महिला पार्षदों का हाल
नगर निगम लखनऊ में कुल 110 वार्ड हैं। इनमें 42 वार्ड में महिला पार्षद हैं। कुल महिला पार्षदों में दो ऐसी हैं जिनमें एक पूर्व पार्षद की मां तो दूसरी पूर्व पार्षद की भाभी हैं।
दो महिला पार्षद लगातार कई सालों से जीत कर सदन में आ रहीं हैं। इनमें एक कांग्रेस की पार्षद तो दूसरी भाजपा की पार्षद हैं।
38 महिला पार्षद ऐसी हैं जिनके वार्ड में सीट महिला आरक्षित होने पर उनके पतियों ने अपनी सीट बचाने के लिए उनको चुनाव मैदान में उतारा और वह विजयी हुईं। असल में इनके वार्ड में पार्षद का काम उनके पति ही कर रहे हैं। पति ही नगर निगम से कामकाज कराने के लिए पार्षदों की तरह पत्र लिखते हैं और पार्षद के हस्ताक्षर भी खुद ही बना देते हैं।
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पार्षद की जगह हर जगह दिखते हैं पति
नगर निगम सदन और कार्यकारिणी की बैठकों में महिला पार्षदों के पति नहीं जा पाते हैं। उन्हें मजबूरी में पार्षद पत्नी को ही भेजना पड़ता है। इसके अलावा नगर निगम की अन्य सभी तरह की बैठकों और गतिविधियों में पार्षद पति ही नजर आते हैं। इस पर कई बार सवाल भी उठे। तब पार्षद पतियों ने सफाई दी कि वह पार्षद प्रतिनिधि के तौर पर बैठक में शामिल हुए हैं। वहीं, इस मामले में महापौर व नगर आयुक्त का रुख भी नरम ही रहा।
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तीन वर्ष में एक भी कार्रवाई नहीं
जनप्रतिनिधियों के संबंधी निकाय के प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, इसे लेकर वर्ष 2012 में शासन ने आदेश जारी किया था। उसके बाद अब तक एक भी पार्षद पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। ज्यादातर महिला पार्षदों के पति ही उनकी जगह पूरा कामकाज करते आ रहे हैं। करीब छह महीने पहले नगर आयुक्त और महापौर की ओर से बुलाई गई जोनवार कार्य समीक्षा बैठक में भी पार्षद पति ही शामिल हुए। इसे लेकर सवाल भी उठे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। ऐसे में अब फिर आदेश जारी होने से कितना फर्क पड़ेगा, ये आने वाला समय ही बताएगा।