ग्रेनो वेस्ट के निवासी बोले, सार्वजनिक परिवहन न होने से देना पड़ता है महंगा किराया, 25-30 फीसदी सैलरी ऑटो और कैब में ही खर्च हो रहे
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माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोेएडा। और कितना इंतजार करें। 10 साल मेट्रो की राह ही तो हम देख रहे हैं। मेट्रो नहीं होने के कारण कैब करके ऑफिस जाना पड़ता है क्योंकि सार्वजनिक वाहन तो है। शेयर ऑटो चलते हैं लेकिन उनके चालक मनमानी करते हैं। इससे घर का बजट भी बिगड़ रहा है। सैलरी का 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा ऑटो व मोबाइल एप आधारित कैब में ही निकल जाता है। पांच से 10 किलोमीटर के लिए 250 से 500 रुपये देने पड़ते हैं। ये कहना है कि ग्रेनो वेस्ट में रहने वाले लोगों का।
इस परेशानी को 120 से अधिक सोसाइटियों के करीब 10 लाख से अधिक निवासी झेल रहे हैं। मुख्य रूप से निजी वाहनों, ऑटो-रिक्शा, ई-रिक्शा और ऐप-आधारित कैब सेवाओं पर निर्भर है। इसके साथ ही निजी वाहनों पर लोगों की निर्भरता है।
निवासियों ने बताया कि सार्वजनिक परिवहन अभाव में निजी कारों और दोपहिया वाहनों का उपयोग करने के लिए लोग मजबूर हैं। उन्होंने बताया कि पीक ऑवर्स में कैब की बुकिंग में देरी और ऑटो ड्राइवरों का मनमाना किराया मांगना, अब तो आम बात हो गई है। इससे निवासियों को हर दिन के सफर में भारी परेशानी होती है।
दिल्ली मेट्रो सेक्टर-52 तक पहुंचने के लिए निवासियों को 6-7 किलोमीटर या उससे अधिक की दूरी ऑटो/कैब से तय करनी पड़ती है जो महंगा और समय लेने वाला है। बढ़ते वाहनों के कारण मुख्य सड़कों, विशेष रूप से किसान चौक (गौड़ सिटी) के पास, भारी जाम का सामना करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि मेट्रो जब तक निवासियों को नहीं मिलेगी। तब तक उन्हें ऐसे ही परेशानी का सामना करना पड़ेगा।
क्या बोले लोग
सोसाइटी में रोजाना ऑफिस और स्कूल जाने के लिए लोग ऑटो और कैब पर ही निर्भर हैं। -अनिल प्रताप सिंह, गौड़ सौंदर्यम
120 से अधिक सोसाइटियों में तेजी से आबादी बढ़ रही है लेकिन सार्वजनिक परिवहन नहीं है। -अश्विनी त्रिपाठी, कैपिटल एथीना
सुबह-शाम ऑटो मिलना मुश्किल हो जाता है। मजबूरी में महंगे किराये पर कैब बुक करना पड़ता है। -अजय भान, सेंचुरियन पार्क
टेक्निकल-नॉन टेक्निकल कमियां हैं। उनको दूर करके निवासियों को ग्रेनो वेस्ट मेट्रो चलानी चाहिए। -दिनेश कुमार, लोटस विला