नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने प्रसिद्धि के लिए दायर की गई कई पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन सोमवार को कड़ी नाराजगी जाहिर की। हाईकोर्ट ने इन याचिकाकर्ताओं पर जुर्माना लगाते हुए कहा कि इन्हें बिना किसी तैयारी के दायर किया गया। इन याचिकाओं में कोरोना मामलों की मीडिया रिपोर्टिंग पर नियंत्रण, एलजी-मुख्यमंत्री राहत कोष के कथित दुरुपयोग की जांच समेत कई मुद्दों को उठाया गया था।
मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की खंडपीठ ने कहा कि इनमें से कई याचिकाओं का विचार दायर करने वालों को चाय पीते हुए या फिर सड़क पर टहलते हुए अचानक आया हुआ लगता है। खंडपीठ ने कहा चाय पीते पीते विचार आया तो सोचा जनहित याचिका दायर करो। कुछ इसी तरह ये याचिकाएं दायर की गई हैं।
खंडपीठ ने एक याचिका खारिज कर याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाते हुए कि उसे याचिका दायर करने से पहले कुछ तैयारी करनी चाहिए थी। याची ने एलजी-मुख्यमंत्री राहत कोष के फंड का कोरोना राहत के नाम पर कथित गबन की जांच कोर्ट की निगरानी में कराने की मांग की थी। खंडपीठ ने कहा कि ये याचिका किसी अन्य शख्स के ट्वीट पर आधारित है। याची ने आरटीआई में ये जानकारी लेने की कोशिश के बिना याचिका दायर की कि फंड का कोई दुरुपयोग हुआ भी है या नहीं।
याची का आरोप था कि राहत कोष का पैसा दिल्ली सरकार ने विज्ञापन पर खर्च किया गया। इसे खारिज करते हुए दिल्ली सरकार के वकील संतोष कुमार त्रिपाठी ने कहा कि इस कोष का एक पैसा भी विज्ञापन पर खर्च नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने कहा के याचिका प्रेरित लगती है। खंडपीठ ने जुर्माने की राशि चार सप्ताह के भीतर दिल्ली सेवा विधिक प्राधिकरण के पक्ष में जमा कराने का निर्देश दिया।
वहीं एक अन्य याचिका दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रों के एक संगठन थिंक एक्ट राइज फाउंडेशन की ओर से दायर की गई। इसमें मांग की गई कि जो कोरोना मरीज आज प्लाज्मा ले रहे हैं उनसे लिखित आश्वासन लिया जाए कि वे ठीक होने के बाद 14 से 28 दिनों के भीतर खुद भी प्लाज्मा दान करेंगे।
खंडपीठ ने याचिका दायर कर दस हजार रुपये का जुर्माना लगाते हुए कहा कि कहा वे दिल्ली सरकार को ऐसी नीति बनाने का निर्देश नहीं दे सकते कि कोरोना लेने वाले मरीज ठीक होने के बाद अनिवार्य रूप से प्लाज्मा दान करेंगे। - एजेंसी