अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस पर विशेष
-500 से अधिक मूकबधिर इसी भाषा से सीख रहे जीवन जीने की कला वर्तमान में
माई सिटी रिपोर्टर
नोएडा। चुप-चाप चुप-चाप झरने का स्वर हम में भर जाए, चुप-चाप चुप-चाप शरद की चांदनी झील की लहरों पर तिर आए, प्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की यह कविता उन मूकबधिरों पर सटीक बैठती है जो सांकेतिक भाषा से स्वयं के जीवन से अंधेरा दूर कर जीवन में आशा और उम्मीदों को देखते हैं। सांकेतिक भाषा सीख कर खुद का भविष्य संवारने वाले यह लोग अब दूसरों का भविष्य बनाने पर काम कर रहे हैं।
शहर के करीब 500 से अधिक ऐसे मूकबधिर हैं जिन्हें सांकेतिक भाषा सिखाकर उन्हें उसी भाषा के जरिए जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। खास बात यह है कि इन्हें पढ़ाने वाले कोई और नही बल्कि ऐसे शिक्षक हैं जो स्वयं उन परिस्थितियों से गुजरे और सांकेतिक भाषा को अपना सारथी बनाया। अब बिना कुछ बोले, बिना कुछ कहे चुपचाप चुपचाप सिर्फ इशारों में ही अपने मन की पूरी बात दूसरों को समझा देते हैं। साइन लैंग्वेज (सांकेतिक भाषा) इन लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है। शहर के सेक्टर 117 में संचालित निजी सामाजिक संगठन में ऐसे कई शिक्षक हैं जिन्होंने पहले सांकेतिक भाषा सीखी और अब वह शहर के ही अन्य मूकबधिरों को भी सांकेतिक भाषा सिखा रहे हैं। साथ ही उनके भविष्य को संवारने के लिए किताबी ज्ञान भी दे रहे हैं।
18 साल पहले शुरु की पढ़ाई
पिछले करीब 18 साल पहले शहर के राहुल ठाकुर ने सांकेतिक भाषा में मूकबधिर बच्चों को सांकेतिक भाषा पढ़ाना शुरु किया था। अब वह छोटे समेत बड़े बच्चों को यही भाषा सिखा रहे हैं, साथ साथ उसी भाषा में विज्ञान और कौशल ज्ञान जैसे विषय में निपुण बना रहे हैं। इसी तरह पिछले 10 सालों से भूपेंद्र सेक्टर 117 स्थिति निजी सामाजिक संस्थान द्वारा संचालित स्कूल में बच्चों को शिक्षित करने में लगे हैं। इसी तरह शुभम, आलोक समेत करीब ऐसे 10 से अधिक मूकबधिर शिक्षक हैं जिन्होंने सांकेतिक भाषा से स्वयं को संवारा और अब आगे के जीवन को भी संवारने में लगे हैं।
माता पिता से बिछड़े मूकबधिरों का बन रहे सहारा
सेक्टर 12 स्थित बालकुटीर के वालंटियर अरुण गौड़ ने बताया कि साईं कृपा संस्थान की ओर से ऐसे मूकबधिरों, दृष्टिबाधितों का सहारा बनते हैं जो अपने माता पिता से बिछड़ चुके हैं। ऐसे में मूकबधिरों के लिए उन्होंने सांकेतिक भाषा भी सीखी है। ताकि ऐसे लोगों को उनके माता पिता से पुलिस के सहयोग में मिलवाया जा सके और यदि वह चाहें तो उन्हें सांकेतिक भाषा सीखने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका यह भी कहना है कि साइन लैंग्वेज यानी सांकेतिक भाषा सीखने के लिए ट्यूटोरियल वीडियो, समेत पीपीटी, व उदारहण के लिए तमाम ऐसे रास्ते खुल चुके हैं, जिसके जरिए सांकेतिक भाषा को सीखा और समझा भी जा सकता है।