माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। सत्र अदालत ने शराब की दुकान के किराये और लाइसेंस से जुड़े विवाद में एफआईआर दर्ज कराने की मांग को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल व्यापार में नुकसान होने या लाइसेंस निरस्त होने से धोखाधड़ी और जालसाजी के अपराध स्वतः स्थापित नहीं हो जाते। न्यायालय ने इसे प्रथम दृष्टया दीवानी (सिविल) प्रकृति का विवाद मानते हुए निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया।
मामले में वादी कोविड बत्रा ने वर्ष 2022 में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में प्रार्थना पत्र देकर सेक्टर-20 थाना क्षेत्र के तीन लोगों विजेंद्र मित्तल, अमित मित्तल और शांता मित्तल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की थी। उनका आरोप था कि आरोपियों ने सेक्टर-27 स्थित एक दुकान को नोएडा प्राधिकरण के रिकॉर्ड में कार्यशील (फंक्शनल) बताकर उन्हें किराये पर दिया और संबंधित दस्तावेज भी दिखाए। उन्होंने दुकान में शराब का कारोबार शुरू करने के लिए करीब 15 लाख रुपये मरम्मत और अन्य कार्यों पर खर्च किए। इसके बाद आबकारी विभाग से अस्थायी लाइसेंस भी प्राप्त कर लिया। बाद में जब स्थायी लाइसेंस की प्रक्रिया के दौरान नोएडा प्राधिकरण से जानकारी ली गई तो पता चला कि संबंधित दुकान प्राधिकरण के रिकॉर्ड में नॉन-फंक्शनल दर्ज है। इसके चलते आबकारी विभाग ने शराब बिक्री का लाइसेंस निरस्त कर दिया। इस कारण उन्हें लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा और भारी मात्रा में शराब का स्टॉक भी नुकसान में बेचना पड़ा। अदालत ने पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 30 अगस्त 2022 को पारित आदेश को बरकरार रखा।