कपकोट (बागेश्वर)। प्रदेश भर में बग्वाल दीपावली के तीसरे या भाईदूज के दिन मनाई जाती है लेकिन गढि़या वंशजों के यहां दिवाली के एक महीने बाद यह पर्व मनाया जाता है। लोक संस्कृति और परंपरा के इस अनूठे पर्व को गढि़या बग्वाल कहा जाता है। इस साल यह त्योहार 20 नवंबर को मनाया जाएगा।
जिले में गढि़या वंशजों की बसासत वाले सभी गांवों में यह पर्व उल्लास के साथ मनाया जाता है। गढि़या बग्वाल मनाने का कोई ऐतिहासिक तथ्य तो नहीं है लेकिन बुजुर्गों का मानना है कि यह परंपरा करीब 300 साल से चली आ रही है। दिवाली पर पर्व नहीं मनाने को लेकर बग्वाल के दिन दुर्घटना हो जाना या गढि़या लोगों के बैल खो जाना जैसी लोक प्रचलित गाथाएं भी हैं। हालांकि यह बातें सत्यता से परे और तर्कहीन अधिक हैं। गढि़या बग्वाल के दिन ईष्टदेव, पितर और गोवंश की पूजा की जाती है। इस पर्व पर विवाहित बेटियों को अनिवार्य रूप से मायके बुलाने की भी परंपरा है। इस समय बेटियां भी ससुराल में खेतीबाड़ी का काम पूरा कर चुकी होती हैं। यह पर्व उनके मायके आकर व्यस्तता के बाद आराम करने का भी माना जाता है।
इनसेट
पोथिंग में रहती है झोड़ा-चांचरी की धूम
गढि़या बग्वाल को पहले केवल गढि़या बिरादरी के लोग ही मनाते थे। अब उनके संबंधी और समीपवर्ती गांवों में रहने वाले कन्याल, कुंवर, बिष्ट, मेहता, दानू, बघरी, लोहार भी मनाने लगे हैं। इस दिन पोथिंग गांव में झोड़ा-चांचरी की महफिल सजती है। गांव में रहने वाले अलग-अलग बिरादरी के लोग मिलकर उल्लास के साथ पर्व को मनाते हैं।
कोट
बुजुर्गों के समय से ही गढ़िया बग्वाल मनाने की परंपरा चली आई है। यह प्रेम भाईचारा, सौहार्दपूर्ण मिलन का त्योहार है। कहावत है कि अंग्रेजों ने हमारे सबसे सम्मानित पूर्वज को दिवाली के दौरान बेकसूर जेल में डाल दिया था। तब भगवती की कृपा से जेल के ताले टूट गए थे। उनके रिहा होकर घर आने की खुशी में गढ़िया वंशजों ने बग्वाल मनाई थी। -शेर सिंह गढि़या (80) पोथिंग
घाटी (नदी किनारे) में च्यूड़े कूटने के लिए धान की फसल पहले तैयार हो जाती है। वहां रहने वाले लोग दीपावली के बाद की द्वितीया (भैयादूज) के दिन च्यूड़ी बग्वाल मनाते हैं। ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र में धान की फसल देर से पकने के कारण यहां लोग मार्गशीष अमावस्या के बाद बग्वाल मनाते हैं। -भीम सिंह दानू (70) पोथिंग
ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फसल देर से पकने के कारण दिवाली के दौरान लोग खेतीबाड़ी में व्यस्त रहते थे। कृषि कार्यों को पूरा कर जब अन्न को कुठार-भंडार में रख दिया जाता था तब फुर्सत के साथ मार्गशीर्ष की अमावस्या के अगले दिन बग्वाल मनाई जाती थी। पूर्वजों के समय की यह परंपरा आज भी चल रही है। -प्रेम सिंह दानू (83) दोबाड
पूर्वजों के समय से हमारे यहां मार्गशीर्ष की अमावस्या के दिन बग्वाल मनाई जाती है। इस पर्व को गढ़िया लोग गढ़िया बग्वाल कहते हैं लेकिन हमारे गांव में इसे केवल बग्वाल कहा जाता है। बघर, कर्मी, दोबाड़, डाना, ढोक्टीगांव में एक गते की रात और दो गते की सुबह त्योहार मनाया जाता है। -प्रवीण सिंह दानू (73) ढोक्टीगांव