इस तरह से करते थे जालसाजी
एसटीएफ के एएसपी राजकुमार मिश्रा ने बताया कि जालसाज किसी न किसी तरह से बैंकिंग और मोबाइल आदि के काम से जुड़े हुए रहे। इसके बाद सभी ने मिलकर फर्जीवाड़ा गिरोह बना लिया। जालसाज सबसे पहले कागज पर फर्जी दस्तावेज के आधार पर कंपनी बनाते थे। इसमें डायरेक्टर से लेकर कर्मचारी सभी फर्जी होते थे। डायरेक्टर से लेकर कर्मचारी के नाम पर फर्जी आधार कार्ड और पैन कार्ड लगाए जाते थे। कार्ड या तो फर्जी होते थे या किसी गरीब शख्स का कार्ड होता था। इन फोटो भी उनके होते थे लेकिन मोबाइल नंबर इन जालसाजों का होता था। इसके बाद आरोपी कंपनी के पांच से छह सौ फर्जी कर्मचारियों के नाम पर हर महीने वेतन खाते में डालते थे, फिर उसमें से निकालकर अगले महीने का वेतन डालते थे। इस तरह करीब एक से डेढ़ साल तक ऐसा करते थे। इससे बैंक में सिबिल स्कोर अच्छा हो जाता था, फिर कर्मचारियों के नाम पर बैंक से ऑनलाइन लोन ले लेते थे। इस तरह अब तक 23 करोड़ रुपये लोन लेने की बात सामने आई है।
फर्जी कर्मचारियों के ईपीएफओ भी कटवाते थे
जांच में पता चला है कि फर्जी कंपनियों में जितने कर्मचारी के नाम पर वेतन डाला जाता था। इनके नाम पर ईपीएफओ भी कटवाया जाता था, ताकि किसी एजेंसी या बैंक को फर्जीवाड़े का शक न हो। अब पुलिस बैंक के साथ-साथ भविष्य निधि कार्यालय से भी इसकी जानकारी लेकर जांच आगे बढ़ाएगी।
यह हुई बरामदगी
518 चेकबुक (विभिन्न बैंकों की), 327 डेबिट कार्ड, 278 पैन कार्ड, 361 एक्टिव सिम कार्ड, 187 मोबाइल, दो कार, दो बाइक, तीन लैपटॉप, एक हार्ड डिस्क, 93 आधार कार्ड, 23 आईडी कार्ड, एक नोट गिनने की मशीन, एक आईकार्ड बनाने की मशीन, 103 फर्जी कागजों की छायाप्रति, विभिन्न कंपनियों की 30 मोहर, 15 ड्राइविंग लाइसेंस, एक लाख 9 हजार रुपये नकद, अकाउंट में 80 लाख फ्रीज।