धार्मिक कक्षाओं में आमतौर पर लोग शास्त्रों का सही अर्थ सुनने आते हैं लेकिन ग्रेटर नोएडा में रविवार को आचार्य प्रशांत ने विद्यार्थियों से कठोपनिषद का मंत्र पढ़कर पूछा कि इसके कौन-कौन से गलत अर्थ निकाले जा सकते हैं। किसी को ईश्वर का भय दिखाई दिया किसी को जातिगत श्रेष्ठता तो किसी को भाग्यवाद। साढ़े चार घंटे के सत्र में करीब डेढ़ घंटे उपनिषद पर चर्चा हुई। मूल सवाल था कि हम ग्रंथों में वही क्यों पढ़ते हैं, जिसे पहले से सही मानते हैं।
आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद से पढ़े आचार्य प्रशांत लेखक और वेदांत के शिक्षक हैं। उनकी पुस्तकें और ऑनलाइन कक्षाएं दर्शन को रोजमर्रा के जीवन से जोड़ती हैं। उनके चिंतन के केंद्र में वह ‘मैं’है, जो ज्ञान, सफलता और पहचान का दावा करता है। उनके अनुसार धर्म का उद्देश्य इसी अहंकार और उससे पैदा होने वाले दुख को समझना है। वह गीता और उपनिषदों को स्त्री-स्वतंत्रता, संबंधों, पशु-अधिकार और जलवायु संकट जैसे विषयों से जोड़ते हैं।
कठोपनिषद के एक मंत्र में ब्राह्मण और क्षत्रिय को भोजन तथा मृत्यु को व्यंजन कहा गया है। आचार्य ने ब्राह्मण को ‘मैं जानता हूं’ और क्षत्रिय को ‘मैं कर सकता हूं’ जैसे अहंकार से जुड़े दावों का प्रतीक बताया। एक विद्यार्थी ने मंत्र पर पहले से सीखा निष्कर्ष लागू करने की कोशिश की, तो आचार्य ने समझाया कि किसी सिद्धांत को मंत्र पर थोपना उचित नहीं है। संभव है कि मंत्र हमारी मौजूदा मान्यताओं के ही विरुद्ध निकले। उनके अनुसार सीखने का अर्थ अपनी मान्यताओं की जांच करना भी है।
हालांकि, इस पद्धति के सामने सवाल भी हैं। स्वतंत्र सोचने के लिए प्रेरित करने वाले शिक्षक ही तय करते हैं कि कौन-सा जवाब मौलिक है और कौन-सा उधार लिया हुआ। चर्चा के दौरान आचार्य विद्यार्थियों को बीच में रोकते हैं और कभी कठोर टिप्पणी भी करते हैं। यह तरीका नियमित विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन नए लोगों को असहज कर सकता है। असली कसौटी यह है कि क्या विद्यार्थी शिक्षक की व्याख्या से भी खुलकर असहमत हो सकते हैं।
कुछ विद्यार्थी आचार्य के एआई उपकरण ‘एपी मिरर’से मंत्र का अर्थ पढ़कर आए थे। आचार्य ने कहा कि तैयार जवाब कई बार अपने अज्ञान को छिपाने का माध्यम बन जाता है। उनका कहना था सही उत्तर पाने में कोई लाभ नहीं है। लाभ है यह जानने में कि मैं कितना गलत हूं। तुरंत जवाब देने वाली तकनीक के दौर में यह टिप्पणी शिक्षा के उद्देश्य पर भी सवाल उठाती है।
पुणे से आईं आरती और उनकी बेटी स्नेहा कमलदिन्नी ने भी अपने अनुभव साझा किए। आरती ने गृहिणी से शिक्षिका बनने और पुस्तक-स्टॉल लगाने का अनुभव बताया। वहीं स्नेहा ने स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल उठाया। आधिकारिक परिणामों के अनुसार मई 2026 में चीन में आयोजित एशियाई जूनियर पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में उन्होंने 52 किलोग्राम वर्ग में डेडलिफ्ट का स्वर्ण तथा स्क्वाट और कुल प्रदर्शन में कांस्य पदक जीते। 51.1 किलोग्राम वजन के बावजूद उन्होंने 175 किलोग्राम उठाया। उनका सवाल था कि अपनी पसंद से जीना स्वतंत्रता है या समाज को गलत साबित करने की मजबूरी। आचार्य ने कहा कि अंधानुकरण और अंधविरोध दोनों में समाज ही केंद्र में रहता है। धार्मिक संस्थाओं में धोखे की आशंका पर उन्होंने हंसते हुए कहा क्या पता मैं भी ठग हूं। फिर जोड़ा मेरा भरोसा मत करो। अपने भरोसे पर आओ।
2017 के नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित पशु-अधिकार कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने पूछा कि मनुष्य अपनी सीमित समझ से दूसरे जीवों की चेतना का फैसला कैसे कर सकता है। आचार्य ने पशुओं को चेतनाहीन मानने से इनकार किया। उनका कहना था कि जानवरों को अनावश्यक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाए और जहां मनुष्य ने उनका प्राकृतिक आवास छीना है, वहां उनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी मनुष्य की है।
इसके बाद आईआईटी बॉम्बे के आमंत्रण पर आचार्य ने शिक्षकों और विद्यार्थियों से ऑनलाइन संवाद किया। इसमें संज्ञान-विज्ञान विशेषज्ञ प्रोफेसर रश्मि गुप्ता और विषाणु-विज्ञानी प्रोफेसर किरण कोंडबागिल शामिल थे। गुप्ता ने पूछा कि उपलब्धियां बढ़ने के बावजूद युवा बेचैन क्यों हैं। आचार्य ने कहा कि शिक्षा स्मृति और बुद्धि को विकसित करती है, लेकिन इनका इस्तेमाल करने वाले ‘मैं’ की पड़ताल कम करती है। यह विचार वैज्ञानिक बहस की गुंजाइश रखता है।
किशोरों की सोशल मीडिया की लत के पीछे विदेशी षड्यंत्र की आशंका पर भी आचार्य ने बिना प्रमाण किसी निष्कर्ष का समर्थन नहीं किया। उन्होंने बेरोजगारी, सस्ते डेटा और पुस्तकालयों तथा खेल के मैदानों की कमी जैसी घरेलू परिस्थितियों की ओर ध्यान दिलाया। इस चर्चा में वेदांत केवल शास्त्रीय ज्ञान नहीं, बल्कि अपने विचारों और विश्वासों को परखने की विधि बनकर सामने आया। सबसे अहम सवाल यही रहा कि हम किसके भरोसे सोचते हैं और क्या अपने शिक्षक को भी परखने का साहस रखते हैं।