हर महीने करीब 30 से 40 ऐसे मरीज आते हैं, जिन्हें जांच में पता चलता है कि वे कलर ब्लाइंड हैं
संवाद न्यूज एजेंसी
नोएडा। लाल, हरे या अन्य रंगों को पहचानने में होने वाली परेशानी को कई लोग सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। कई बार व्यक्ति को बचपन से ही कलर विजन डेफिशिएंसी यानी वर्णान्धता की समस्या होती है, लेकिन इसकी जानकारी उसे वर्षों बाद पता चलती है। जिला अस्पताल में ऐसे मरीज जांच और परामर्श के लिए पहुंच रहे हैं। अस्पताल में तैनात नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. पंकज त्रिपाठी के अनुसार, हर महीने करीब 30 से 40 ऐसे मरीज आते हैं, जिन्हें जांच में पता चलता है कि वे कलर ब्लाइंड हैं।
डॉ. पंकज त्रिपाठी ने बताया कि कई मरीज ऐसे भी आते हैं, जिन्हें बचपन में जांच नहीं होने के कारण समस्या का पता नहीं चल पाता। वे पढ़ाई पूरी करने, नौकरी की तैयारी करने या करियर के किसी महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंचने के बाद जांच कराते हैं और तब उन्हें कलर विजन डेफिशिएंसी की जानकारी मिलती है। उन्होंने बताया कि बच्चों की आंखों की जांच बचपन में ही कराना जरूरी है। जब बच्चा स्कूल जाना शुरू करे, उसी दौरान सामान्य आंखों की जांच के साथ कलर विजन की भी जांच कराई जानी चाहिए।
सबसे ज्यादा लाल-हरे रंग की पहचान में परेशानी
डॉ. ने बताया कि कलर विजन डेफिशिएंसी में व्यक्ति को कुछ रंगों के बीच अंतर करने में परेशानी होती है। सबसे सामान्य स्थिति में लाल और हरे रंग को पहचानने में दिक्कत होती है। कुछ लोगों में समस्या हल्की होती है, जबकि कुछ मरीजों को कई रंगों के बीच अंतर करने में कठिनाई हो सकती है। यह समस्या जन्मजात भी हो सकती है और कई मामलों में व्यक्ति लंबे समय तक इसके साथ सामान्य जीवन जीता रहता है।
बीमारी का इलाज नहीं, लेकिन जानकारी जरूरी
डॉ. पंकज त्रिपाठी के अनुसार, कलर ब्लाइंडनेस का कोई निश्चित इलाज नहीं है। इसलिए इसका समय पर पता होना सबसे ज्यादा जरूरी है। समस्या की जानकारी होने पर व्यक्ति अपने करियर का विकल्प चुनते समय सावधानी बरत सकता है। कुछ सेवाओं और तकनीकी क्षेत्रों में रंगों की सही पहचान जरूरी होती है। डॉक्टर के मुताबिक यह मानना सही नहीं है कि यह केवल पुरुषों की समस्या है। यह किसी भी लिंग के व्यक्ति को हो सकती है। हालांकि लाल-हरा रंग पहचानने वाली आनुवंशिक समस्या पुरुषों में अधिक देखी जाती है।