गोवा का वीडियो और वापसी के बाद प्लांट का प्रस्ताव भी जांच के दायरे में
-300 मीट्रिक टन क्षमता का वेस्ट टू एनर्जी प्लांट लगवाने की थी तैयारी, प्लांट लगता तो करीब चार गुना जाता निस्तारण शुल्क
-वीडियो की जांच सरकारी फॉरेंसिक लैब से कराने का निर्णय आज ले सकता है प्राधिकरण, ऐसा होने पर जांच में पुलिस की एंट्री होगी
माई सिटी रिपोर्टर
नोएडा। वेस्ट टू एनर्जी प्लांट देखने के लिए नोएडा प्राधिकरण के जन स्वास्थ्य विभाग का जुलाई 2025 में गोवा दौरा कथित वीडियो के साथ की गई शिकायत के बाद चर्चा में है। शासन से लेकर प्राधिकरण तक ने शिकायत को गंभीरता से लिया है। वरिष्ठ अधिकारी जिसके खिलाफ आरोप लगाए गए हैं उन्होंने वीडियो को एआई से बनाया गया बताकर पल्ला झाड़ा है। जांच के लिए वीडियो दो निजी लैब में भेजा गया है।
जांच के दायरे में वीडियो के साथ ही अधिकारियों की वापसी के बाद बनाया गया 300 मीट्रिक टन क्षमता का वेस्ट टू एनर्जी प्लांट लगाने का प्रस्ताव भी आ गया है। इस प्रस्ताव को नोएडा के लिए बड़े आर्थिक भार का हवाला देकर उच्च स्तर पर अधिकारियों ने रोका दिया था। प्लांट लगता तो प्राधिकरण को मौजूदा की तुलना में करीब चार गुना ज्यादा खर्च कूड़ा निस्तारण के लिए करना पड़ता।
गोवा का वेस्ट टू एनर्जी मॉडल कूड़ा निस्तारण के लिए देश के सबसे मंहगे मॉडल में शुमार है। बात अगर कूड़ा प्रबंधन व निस्तारण की करें तो देश के सबसे साफ शहर इंदौर व सूरत कूड़े से कमाई कर रहे हैं। इन शहरों ने अपनी जमीन निजी एजेंसियों को दी हुई है। एजेंसियां गीले कूड़े से गैस, सीएनजी बनाती हैं। सूखे कूड़े की छटनी होती है, उससे भी कमाई होती है। इसके बदले में स्थानीय निकायों को करोड़ में धनराशि प्रतिवर्ष मिलती है। सफाई में टॉप शहरों की तुलना में गोवा का वेस्ट टू एनर्जी मॉडल जो नोएडा प्राधिकरण कॉपी करने जा रहा था वह कई गुना मंहगा था। गोवा में करीब 2900 रुपये प्रति मीट्रिक टन एजेंसी को कूड़ा निस्तारण के लिए भुगतान हो रहा है। नोएडा सेक्टर-145 में 774 रुपये प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से बायोरेमिडेशन के जरिए कूड़े का निस्तारण करवा रहा है।
सरकारी लैब से वीडियो जांच में हो सकती है पुलिस की एंट्री: 24 जनवरी को हुई वीडियो, शपथपत्र के साथ शिकायत की जांच अब तक शासन और प्राधिकरण के बीच में है। प्राधिकरण ने दो निजी फॉरेंसिक लैब को वीडियो जांच के लिए भेजा है। शिकायतकर्ता ने प्राधिकरण में अपना पक्ष रखा है कि वीडियो में वह वरिष्ठ अधिकारी प्लांट लगवाने के बदले कमीशन की अनुचित मांग करते हुए दिखाई दे रहे हैं। निजी लैब की जांच को सरकारी विभाग में प्रमाणिक नहीं माना जा सकता है। इसलिए प्राधिकरण सरकारी लैब से जांच करवाने पर विचार कर रहा है। सरकारी लैब से फॉरेंसिक जांच के लिए आपराधिक कारण स्पष्ट करने होंगे। प्रक्रिया के तहत एफआईआर भी दर्ज होती है। ऐसा होने पर जांच में पुलिस की एंट्री हो सकती है। फिलहाल इन सभी विंदुओं पर प्राधिकरण आज मंथन करेगा।