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पीड़ा: दर्द बयां करते हुए दिहाड़ी मजदूर की आंखों से छलके आंसू, बोला-नौकरी मिली न मजदूरी...कई बार सोना पड़ता है भूखे पेट

Mon, 05 Jul 2021 10:25 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, नोएडा

सार

अपना दर्द बयां करते हुए लेबर चौक पर काम की तलाश में खडे़ दिहाड़ी मजदूर संजय की आंखों से आंसू छलक पड़े। मूल रूप से मध्यप्रदेश के छतरपुर-नरनौला निवासी संजय ने बताया कि  कक्षा-9 तक पढ़ा है और नोएडा में पहले नौकरी कर चुका था। कुछ कारणों से नौकरी छोड़कर उसे घर जाना पड़ा। 
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दिहाड़ी मजदूर संजय - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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कोरोना की पहली लहर के बाद चार माह पहले काम की तलाश में नोएडा आया था। काम मिलने से पहले ही दूसरी लहर ने कहर बरपाना शुरू कर दिया और फिर लॉकडाउन लग गया। ऐसे में नौकरी मिलना तो दूर कोई कंपनी गेट पर भी खड़ा नहीं होने देती थी। पैसे भी खत्म हो गए तो दो वक्त की रोटी के लाले पड़ने लगे। 
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दो दिन बिस्किट खाकर और पानी पीकर समय काटा। जब नौकरी नहीं मिली तो लेबर चौक पर दिहाड़ी मजदूरी शुरू कर दी। दो दिन काम मिला फिर वो भी बंद हो गया। ऐसे में कई बार तो भूखे पेट सोना पड़ा। रोटी के लिए सामाजिक संगठनों द्वारा भोजन वितरण की बाट जोहनी पड़ती। 

अपना दर्द बयां करते हुए लेबर चौक पर काम की तलाश में खडे़ दिहाड़ी मजदूर संजय की आंखों से आंसू छलक पड़े। मूल रूप से मध्यप्रदेश के छतरपुर-नरनौला निवासी संजय ने बताया कि  कक्षा-9 तक पढ़ा है और नोएडा में पहले नौकरी कर चुका था। कुछ कारणों से नौकरी छोड़कर उसे घर जाना पड़ा। 
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कोरोना की पहली लहर के बाद घर से कुछ रुपये लेकर दोबारा काम की तलाश में शहर आया था। खोड़ा में एक हजार रुपये में कमरा लेकर रहना शुरू कर दिया। कई दिन बीतने के बाद नौकरी नहीं मिली तो भूखे सोने की नौबत आ गई। इसके बाद जब वह लेबर चौक पहुंचा और दिहाड़ी मजदूरी करने की ठान ली। 
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पहली बार में 300 रुपये मजदूरी के मिले तो पहले पेट भर खाना खाया। अगले दिन काम की तलाश में फिर से लेबर चौक पर गया, लेकिन काम ही नहीं मिला। संजय ने बताया कि 4 माह से इसी तरह जो कमाता हूं, उसी से पेट भर लेता हूं। अब न तो स्वयं का खर्च चल पाता है और न ही घर पर बच्चों के लिए कुछ भेज पा रहा हूं। 

जबकि, कोरोना से पहले हर माह 8 से 10 हजार रुपये तक घर भेज देता था। जिससे परिवार का गुजारा हो जाता था। अब हालत यह है कि वापस घर जाने तक के पैसे नहीं हैं। वहां परिवार भी आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा है। गांव के लोगों की मदद से किसी तरह भरण-पोषण हो पा रहा है।    
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