कोरोना की पहली लहर के बाद चार माह पहले काम की तलाश में नोएडा आया था। काम मिलने से पहले ही दूसरी लहर ने कहर बरपाना शुरू कर दिया और फिर लॉकडाउन लग गया। ऐसे में नौकरी मिलना तो दूर कोई कंपनी गेट पर भी खड़ा नहीं होने देती थी। पैसे भी खत्म हो गए तो दो वक्त की रोटी के लाले पड़ने लगे।
दो दिन बिस्किट खाकर और पानी पीकर समय काटा। जब नौकरी नहीं मिली तो लेबर चौक पर दिहाड़ी मजदूरी शुरू कर दी। दो दिन काम मिला फिर वो भी बंद हो गया। ऐसे में कई बार तो भूखे पेट सोना पड़ा। रोटी के लिए सामाजिक संगठनों द्वारा भोजन वितरण की बाट जोहनी पड़ती।
अपना दर्द बयां करते हुए लेबर चौक पर काम की तलाश में खडे़ दिहाड़ी मजदूर संजय की आंखों से आंसू छलक पड़े। मूल रूप से मध्यप्रदेश के छतरपुर-नरनौला निवासी संजय ने बताया कि कक्षा-9 तक पढ़ा है और नोएडा में पहले नौकरी कर चुका था। कुछ कारणों से नौकरी छोड़कर उसे घर जाना पड़ा।
कोरोना की पहली लहर के बाद घर से कुछ रुपये लेकर दोबारा काम की तलाश में शहर आया था। खोड़ा में एक हजार रुपये में कमरा लेकर रहना शुरू कर दिया। कई दिन बीतने के बाद नौकरी नहीं मिली तो भूखे सोने की नौबत आ गई। इसके बाद जब वह लेबर चौक पहुंचा और दिहाड़ी मजदूरी करने की ठान ली।