1890 में 40 टिफिन से हुई थी शुरुआत, आज रोजाना 2 लाख टिफिन पहुंचा रहे
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। नॉलेज पार्क स्थित शारदा विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ बिजनेस स्टडीज में बृहस्पतिवार को बीबीए और एमबीए के विद्यार्थियों के लिए डब्बावाला मैनेजमेंट लेक्चर का आयोजन हुआ। कार्यक्रम में डब्बावाला सुबोध सांगले और उल्लास भाऊ ने विद्यार्थियों को डब्बा वाला की कार्य पद्धति व प्रबंधन से जुड़ी कई रोचक बातें बताईं। दुनियाभर में मिसाल बन चुके मुंबई डब्बावाला सिस्टम में हर रोज करीब 5 हजार लोगों की टीम घर से लेकर दफ्तर तक दो लाख टिफिन पहुंचाती है। इस काम से जुड़े लोगों की औसतन पढ़ाई आठवीं तक है, लेकिन दुनियाभर में इस काम में निपुणता का प्रतिशत 99.99 माना जाता है।
डब्बावाला सुबोध सांगले ने भावी प्रबंधकों को 1890 में 40 टिफिन से शुरू होकर आज 2 लाख टिफिन तक पहुंचने की सफल कहानी के बारे में बताया। छात्रों को बताया कि अनुशासन, ईमानदारी और काम करने का जज्बा ही डब्बावाला सिस्टम की सफलता का मूल मंत्र है। उन्होंने बताया कि कोडिंग सिस्टम से पूरा डब्बा सिस्टम संचालित हो रहा है। हर कारोबार के लाभ बहुत जरूरी है। हम ग्राहक को मना नही कर सकते, ग्राहक राजा होता है। हम एक ग्राहक से महीने में 800 रुपये लेते है।
उन्होंने बताया कि वह वर्तमान में तकनीक का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। आजतक डब्बावाला की हड़ताल नहीं हुई। तीन घंटे के अंदर खाना घर से लेकर दफ्तर तक पहुंचाते है। हर रोज 60 से 70 किलोमीटर तक का सफर तय करने के लिए साइकिल और मुंबई की लोकल ट्रेन की मदद लेते है। विश्वविद्यालय के प्रो. चांसलर वाइके गुप्ता ने कहा कि 135 वर्षों से चला आ रहा डब्बावाला सिस्टम में कुछ अलग तो है, जो अब तक सफलता से चल रहा है। देश- विदेश की सभी टॉप यूनिवर्सिटी इनके सिस्टम पर केस स्टडी कर चुकी है। उन्होंने छात्रों से कहा कि सीख आप कहीं से भी सकते है ये जरूरी नही आप शिक्षित हो तो आप सफल है। सफलता पाने के लिए मेहनत, लगन और ईमानदारी होनी चाहिए। इस मौके प्रो. वाइस चांसलर परमानंद, डॉ राजीव गुप्ता, डॉ देबाशीष मलिक, डॉ निखिल कुलश्रेष्ठ, डॉ रचना बंसल,डॉ रुचि जैन,डॉ श्वेता दीक्षित समेत एचओडी मौजूद रहे।