चेक बाउंस मामले में दोष सिद्धि बरकरार, जुर्माना 2.50 लाख से घटाकर 1.60 लाख किया
एक माह की सजा बरकरार, 1.50 लाख रुपये परिवादी को प्रतिकर देने का आदेश
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। सत्र अदालत ने चेक बाउंस के मामले में निचली अदालत के दोषसिद्धि आदेश को बरकरार रखकर सजा में आंशिक संशोधन किया है। अदालत ने नोएडा स्थित कारोबारी फर्म हॉज मोड की ओर से दायर आपराधिक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए जुर्माने की राशि 2.50 लाख से घटाकर 1.60 लाख रुपये कर दी, जबकि एक माह के साधारण कारावास की सजा यथावत रखी।
साथ ही आदेश दिया कि अर्थदंड में से 1.50 लाख रुपये परिवादी पर्थ फैब्रिक्स को प्रतिकर के रूप में दिए जाएंगे। मामले के अनुसार पर्थ फैब्रिक्स ने आरोप लगाया था कि हॉज मोड की ओर से 15 अगस्त 2016 को तीन चेक जारी किए गए थे, जिनकी कुल राशि 1,44,236 रुपये थी। इन चेकों को भुगतान के लिए बैंक में प्रस्तुत किया गया लेकिन भुगतान रोक दिए जाने के कारण 2 नवंबर 2016 को वह बाउंस हो गए। इसके बाद 11 नवंबर 2016 को विधिक नोटिस भेजा गया। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होने पर 20 दिसंबर 2016 को धारा-138 परक्राम्य लिखत अधिनियम (एनआई एक्ट) के तहत परिवाद दायर किया गया।
न्यायालय ने साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद 26 अक्तूबर 2023 को आरोपी को दोषी ठहराया और 3 नवंबर 2023 को एक माह के साधारण कारावास और 2.50 लाख रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी। इसमें से 2.25 लाख रुपये परिवादी को प्रतिकर के रूप में देने का भी आदेश दिया गया था। इसी निर्णय को चुनौती देते हुए अपील दायर की गई थी। अपील में हॉज मोड की ओर से तर्क दिया गया कि संबंधित चेक सुरक्षा (सिक्योरिटी) के रूप में दिए गए थे और बाद में समस्त भुगतान आरटीजीएस और अन्य माध्यमों से कर दिया गया था। परिवादी ने जिरह के दौरान स्वयं स्वीकार किया कि वर्ष 2016 से 2018 के बीच उसे भुगतान प्राप्त हुआ और दोनों पक्षों के बीच लगातार व्यापारिक संबंध बने रहे। इसलिए चेक की राशि कानूनी रूप से देय नहीं थी तथा निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों की समुचित विवेचना नहीं की।