बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासन समिति के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने जिला दीवानी एवं फौजदारी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज भाटी बोड़ाकी के लाइसेंस को निरस्त किया था। अब बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि यह मामला किसी अधिवक्ता के पेशेगत या अन्य कदाचार का बनता ही नहीं दिखता, इसलिए राज्य बार काउंसिल की पूरी कार्यवाही ही भ्रामक प्रतीत होती है। समिति ने यह भी कहा कि अपील लंबित रहने तक अपीलकर्ता जहां चाहें, वहां प्रैक्टिस कर सकते हैं। यूपी बार काउंसिल के आदेश पर रोक लगाने के बाद जिला दीवानी एवं फौजदारी बार गौतम बुद्धनगर का से उन्हें फिर से अध्यक्ष बनाया गया है।
मामला मनोज कुमार भाटी बनाम वीरेंद्र सिंह एवं अन्य शीर्षक से सूचीबद्ध है। इसकी सुनवाई हाइब्रिड माध्यम से हुई। समिति की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने की। सदस्य के रूप में अधिवक्ता करणजीत सिंह और सहयोजित सदस्य के रूप में अधिवक्ता अजय चौधरी शामिल रहे। अपीलकर्ता मनोज कुमार भाटी अपने अधिवक्ता गौरव सिंह और शोभा राम के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। प्रतिवादी वीरेंद्र सिंह भी अपने अधिवक्ता योगेश के साथ मौजूद रहे। अपीलकर्ता पक्ष ने कई आधारों पर राज्य बार काउंसिल के आदेश को चुनौती दी। उन्होंने पहली दलील यह थी कि राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति के समक्ष उन्हें सुनवाई का उचित अवसर नहीं दिया गया।
दूसरी दलील देरी को लेकर थी। शिकायत वर्ष 2021 में दर्ज हुई, जबकि अंतिम निर्णय 2026 में आया। अधिवक्ता अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति को एक वर्ष के भीतर मामला निपटाना होता है। ऐसा नहीं होने पर मामला बार काउंसिल ऑफ इंडिया को स्थानांतरित हो जाता है। एक वर्ष की अवधि बीतने के बाद राज्य अनुशासन समिति को किसी भी अनुशासनात्मक मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं रह जाता, इसलिए आदेश क्षेत्राधिकार से बाहर है। तीसरी दलील यह थी कि यह मामला अधिवक्ता अधिनियम के अध्याय-5 के तहत आता ही नहीं और इसमें कदाचार का कोई प्रश्न नहीं है, इसलिए आदेश अवैध है। दूसरी ओर प्रतिवादी के अधिवक्ता ने कहा कि राज्य बार काउंसिल में एक वर्ष से अधिक समय से कई मामले लंबित हैं।
क्या हैं आरोप
समिति ने अपने आदेश में दर्ज किया कि आरोप के अनुसार अपीलकर्ता ने अपनी डिग्रियों और उपस्थिति पत्रकों (अटेंडेंस शीट) के संबंध में गलत जानकारी देकर नामांकन कराया। समिति के मुताबिक पूरा आरोप नामांकन से पहले की गलतबयानी से जुड़ा है, यानी उस समय से जब वह अधिवक्ता थे ही नहीं। समिति ने स्पष्ट किया कि अधिवक्ता अधिनियम का अध्याय-5 अधिवक्ताओं के आचरण से संबंधित है। अनुशासनात्मक कार्यवाही केवल नामांकन के बाद हुए पेशेगत या अन्य कदाचार के मामले में ही शुरू की जा सकती है। समिति के अनुसार ऐसा मामला अधिक से अधिक धारा-26 के दायरे में आ सकता है।
वह भी तब जब आरोप सिद्ध हों। धारा-26 निष्कासन की कार्यवाही से जुड़ी है। यदि अपीलकर्ता ने गलतबयानी की हो, कोई तथ्य छिपाया हो या फर्जी डिग्री के आधार पर नामांकन कराया हो, तो ऐसे सभी तथ्यों पर राज्य बार काउंसिल की धारा-26 के तहत गठित अलग समिति विचार करती है। ऐसे मामलों में निष्कासन का अंतिम आदेश बार काउंसिल ऑफ इंडिया ही पारित करती है।
सेवा के दौरान की डिग्री और डिस्चार्ज सर्टिफिकेट
आदेश में दर्ज तथ्यों के अनुसार अपीलकर्ता पहले सेवा में थे। सेवानिवृत्ति पर उन्होंने नामांकन समिति के समक्ष अपना डिस्चार्ज सर्टिफिकेट प्रस्तुत किया। उस प्रमाणपत्र में दर्ज है कि उन्होंने स्नातक और एलएलबी की डिग्रियां सेवा में रहते हुए प्राप्त की थीं। अपीलकर्ता का नामांकन वर्ष 2009 में हुआ और तब से वह प्रैक्टिस कर रहे हैं, जबकि शिकायत वर्ष 2021 में ही दर्ज की गई।
इन तथ्यों के आधार पर समिति ने प्रथम दृष्टया माना कि राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति का आदेश कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है। इसके बाद समिति ने प्रतिवादी को निर्देश दिया कि वह विस्तृत जवाब दाखिल कर बताए कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 26 के तहत कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए और विवादित आदेश को क्यों न रद्द कर दिया जाए। यह जवाब आज से छह सप्ताह के भीतर दाखिल करना होगा।
रिकॉर्ड तलब, दिसंबर में अंतिम सुनवाई
समिति ने कार्यालय को निर्देश दिया कि उत्तर प्रदेश बार काउंसिल से मामले का रिकॉर्ड मंगाया जाए और अपील को दिसंबर के पहले सप्ताह में अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए। अपील के लंबित रहने तक विवादित आदेश का प्रभाव स्थगित रहेगा और अपीलकर्ता को जहां चाहें प्रैक्टिस करने की अनुमति होगी।