प्राधिकरण को वापस नहीं मिल रही रकम, कैसे होंगे काम
नोएडा। नोएडा प्राधिकरण ने अलग-अलग एजेंसियों और संस्थाओं को ऋण व अग्रिम के मद में हजारों करोड़ रुपए दिए। शर्त यह थी कि एजेंसियों को तय समय में इसे चुकाना है, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और प्राधिकरण की पूंजी फंस गई। इसका असर विकास कार्यों पर भी पड़ा। आलम यह है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में तय की गई छोटी रकम भी अब तक वापस नहीं मिल पाई। वित्तीय वर्ष के 10वें माह में दिए गए ऋण का 2.39 प्रतिशत ही वापस मिला। लिहाजा आगे भी विकास कार्यों पर असर पड़ना स्वाभाविक है। प्राधिकरण की 201वीं बोर्ड बैठक में सदस्यों को इसकी जानकारी दी गई।
दरअसल, नोएडा प्राधिकरण ने वित्तीय वर्ष 2020-21 में अलग-अलग एजेंसियों से 1060.55 करोड़ रुपये वापसी का लक्ष्य रखा। आंकड़ों के मुताबिक 31 दिसंबर 2020 तक प्राधिकरण को केवल 25.37 करोड़ ही वापस मिल पाए। वह भी तब जबकि प्राधिकरण ने ऋण व अग्रिम बकाये का कुछ प्रतिशत ही वापसी का लक्ष्य रखा था। बकाये की राशि इससे कई गुना ज्यादा है।
छह एजेंसियों के पास से नहीं आया एक भी रुपया
नोएडा प्राधिकरण ने उत्तर प्रदेश हथकरघा निगम से 2.5 करोड़, यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण से 400 करोड़, ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण से 400 करोड़, उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड से 50 करोड़, आगरा विकास प्राधिकरण से 5 करोड़ और आईआरसी आम्रपाली सिलिकॉन सिटी से 1.05 करोड़ रुपये के ऋण वापसी का लक्ष्य निर्धारित किया था। वर्तमान वित्तीय वर्ष में एक भी रुपया वापस नहीं मिला। जबकि प्राधिकरण के सबसे ज्यादा पैसे यहीं हैं। इससे इतर केवल एक एजेंसी से प्राधिकरण को 25 करोड़ रुपये वापस मिले। जबकि इस एजेंसी से 200 करोड़ की उम्मीद थी।
बिल्डरों से मिली केवल 9 प्रतिशत राशि
प्राधिकरण का बिल्डरों पर करीब 25 से 30 हजार करोड़ का बकाया है। इन रुपयों की वापसी के लिए खूब प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, सफलता का प्रतिशत शून्य है। आलम यह है कि बिल्डरों से केवल 700 करोड़ रुपए की वापसी का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। बीते दस माह में केवल 64.25 करोड़ की वापसी हुई है। तय लक्ष्य पाने में सबसे ज्यादा सफलता आवासीय प्लॉट, वाणिज्यिक, आवासीय भवन और औद्योगिक विभाग को मिली, लेकिन इनका लक्ष्य भी पूरा होने में समय लगेगा।
विकास कार्यों में कटौती
नोएडा प्राधिकरण के पास फंड की कमी की वजह से विकास कार्यों में कटौती करनी पड़ रही है। कई योजनाओं की अनुमानित लागत को कम किया गया है। बेहद जरूरी विकास परियोजनाओं के ही काम कराने की कोशिश हो रही है। ऐसे में विकास पर खासा असर पड़ेगा।