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10,000 मेवातियों के बलिदान से ऐसे रोशन हुआ हिंदूस्तान

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10,000 मेवातियों के बलिदान से रोशन हुआ हिंदुस्तान
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नगीना (नूंह)। आजादी की पहली लड़ाई में मेवात क्षेत्र के 10 हजार से अधिक सूरमाओं ने बलिदान दिया था, जिनकी याद में वर्ष 2009 के दौरान बनने वाले 13 स्मारकों में से केवल 7 ही बन सके हैं। दो स्मारकों का कार्य नींव तक पहुंचा तथा 4 स्मारकों का कार्य अभी तक शुरू ही नहीं हुआ। दिल्ली से सटा मेवात क्षेत्र वही इलाका है जिसके जांबाजों के डर से अंग्रेजी हुकूमत के दौरान राजधानी के दरवाजे शाम ढलने से पहले ही बंद हो जाते थे।
गुरुग्राम गजेटियर से मिली जानकारी कए अनुसार, वर्ष 1857 के गदर में मेवात के महागदर ने दुश्मनों को धूल चटा दी। मेरठ से शुरू हुई आजादी की लहर का सबसे ज्यादा असर मेवात क्षेत्र में दिखाई दिया। मेवाती क्रांतिकारियों ने जिस जोश व रोष के साथ दुश्मनों का सामना किया, उसकी मिसाल इतिहास के सुनहरे पन्ने आज भी ताजा करते हैं। गजेटियर के अनुसार, मार्च 1858 में अंग्रेजों ने मेवात की राजधानी बड़कली चौक के गांव नगीना, घागस-कंसाली, सरल और मांडीखेड़ा में जमकर गदर मचाया। अकेले कंसाली-घागस गांव के गरीबा मेव समेत 61 क्रांतिकारी शहीद हुए। अगले दिन क्रांतिकारी घीरी मेव समेत 283 लोगों ने जान दे दी। सरल गांव के हन्नू खां के अलावा 14 तथा फिरोजपुर झिरका के इसराइल कवलखां समेत 15 लोगों की मौत हुई। मांडीखेड़ा व नगीना के उदय सिंह, सावंत व 91 लोगों ने आजादी पाने के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदों पर झूल गए। करीब 13 माह तक चले 1857 के गदर में 19 नवंबर को घासेड़ा में 157 तथा रूपडाका गांव में 425 क्रांतिकारियों को गोलियों से भूना गया और कुछ लोगों को फांसी पर चढ़ाया। गढ़ी, होडल में किशन लाल व किशन सिंह सहित 85 और हसनपुर में चांदखां व रहीमखां तथा सहसौला फिरोजखां मेव समैत 12 लोगों को फांसी हुई। बड़का अलीमुद्दीन में खुशीखां समेत 12, नूंह में 18, तावडू में 19 और महूं तिगांव में बदरूद्दीन समेत 73 क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए बलिदान दिया।
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इतिहासकार एवं अखिल भारतीय शहीद सभा के राष्ट्रीय चेयरमैन सरफूद्दीन खान मेवाती का कहना है कि साल 2008 में हरियाणा प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. एआर किदवई के सहयोग से मेवात विकास अभिकरण ने साल 2009 में 13 शहीद स्मारक 13 पालों में शहीद हुए मेवातियों के बलिदान के लिए बनाने शुरू हुए थे। इनमें से नगीना, फिरोजपुर झिरका, महूं-चौपड़ा, नूंह, दोहा-रावली, तावड़ू, उटावड़ में बन चुके हैं जबकि आकेड़ा, इंदाना, पिनगवां, पुन्हाना में अभी तक काम शुरू नहीं हुआ है। वहीं शाहपुर नंगली व बड़का अलीमुद्दीन में नींव तक कार्य कई साल अधूरा पड़ा है। इतिहासकार मोहम्मद अरशद ने बताया कि रूपड़ाका गांव के 425 शहीदों की याद में सन् 1983 के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री भजन लाल, तत्कालीन सांसद चौधरी रहीम खां, तत्कालीन विधायक अजमत खान ने शहीद स्मारक बनवाया था। नूंह उपायुक्त पंकज कुमार ने अनभिज्ञता जताते हुए कहा कि मैंने अभी तैनाती हुई है, फाइल देखकर ही बता पाऊंगा कि 6 स्मारकों का काम अभी तक क्यों रुका है।

फोटोऱ् जिला नूंह में खेडला मोड पर बने शहीदी स्मारक पर लिखे मेवाती शहीदों के नाम।
फोटोऱ् नगीना कॉलेज में बना शहीदी स्मारक।
फोटोऱ् जिला नूंह के गांव शाहपुर नंगली में नींव पर अधूरा पड़ा शहीद स्मारक।
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