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आधुनिकता की भेंट चढी हरियाली तीज, ढूंढे नहीं दिखाई नहीं दे रहे झूले

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आधुनिकता की भेंट चढ़ी हरियाली तीज, ढूंढे नहीं दिखाई दे रहे झूले
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तावडू। हरियाली तीज पर्व का हिंदू धर्म में बड़ा महत्व है, खासकर बृज क्षेत्र में इसे धूमधाम से मनाया जाता है। सावन शुरू होते ही तीज की तैयारियों में लोग जुट जाते हैं और पेड़ों पर झूले और सावन की फुहार से इस पर्व के महत्व को जाना जाता है। इस अवसर पर बहन-बेटियों को सिंधारा भेजा जाता है। नवविवाहिता पहली तीज अपने मायके में ही मनाती हैं। दरअसल, इस मौके पर झूले का विशेष महत्व है लेकिन अब पेड़ों की डाल पर झूले की बजाये कृत्रिम झूले झूलकर त्योहार की महज औपचारिकता ही पूरी की जा रही है।
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रेखा, पुष्पा, शशिबाला, सोनिया, मधूरानी व काजल आदि का कहना है कि बृज चौरासी कोस की परिक्रमा में पड़ने वाले इस क्षेत्र में कभी सावन लगते ही पेड़ों पर झूले और तीज के गीतों की भिन्नी -भिन्नी फुहार मे आहट सुनाई देती थी। नव विवाहिता अपनी सखियों के संग झूले की पींग भरकर सावन के गीतों की किलकारियां भरती दिखाई देती थीं लेकिन बदलते परिवेश में पारंपरिक उत्सव भी आधुनिकता की भेंट चढ़ गए हैं। जबकि पहले कभी आसमान पतंगों से ढका रहता था, लेकिन आज आसमान में एकाध ही पतंग दिखाई दे रही है। ब्यूरो
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