शाहबेरी में बिल्डिंग गिरने की वजह सिर्फ घटिया निर्माण सामग्री या लापरवाही ही नहीं, बल्कि बदलता वातावरण भी है। शहर की मिट्टी को बांधकर रखने वाले हरित पेड़ ही गायब होते जा रहे हैं। हर साल लाखों पौधे लगाने के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन कितने पौधे बढ़े या घटे हैं इसका कोई आंकड़ा नहीं है। भूजल दोहन भी लगातार किया जा रहा है। नदियों का स्तर घट रहा है। यही वजह है कि हमारी जमीन नीचे से खोखली होती जा रही है।
नोएडा शहर 19,600 हेक्टेयर जमीन पर बसा है। इसका महज 17 प्रतिशत भाग में ही हरियाली है जबकि मानकों के तहत यह दायरा करीब 23 फीसदी से अधिक होना चाहिए। गांवों को हरित की संज्ञा दी गई, लेकिन यहां की जमीनों पर दूर-दूर तक रिहायशी इमारतें ही दिख रही हैं। इसमें अधिकांश इमारत शाहबेरी जैसे हादसों के लिए तैयार हैं। यही नहीं सेक्टरों व सोसाइटी में 20 से 25 मंजिल तक की इमारतें खड़ी हैं। यहां सांस लेना तक दूभर है।
बिल्डरों ने बड़ी इमारतें को खड़ी कर दी है, लेकिन हरित क्षेत्र की बात करें तो यहां की इमारतों के बीच 5 प्रतिशत भी हरियाली नहीं है। कई स्थानों पर तो एक भी हरित पौधा नहीं है। इससे यहां मिट्टी का कटाव बढ़ता जा रहा है, जबकि नोएडा भूकंप जोन-4 में आता है यानी यहां भूकंप का एक तेज झटका भी बड़े हादसे का सबब बन सकता है।
हरित क्षेत्र न होने की वजह से सोसाइटियों में ऑक्सीजन का स्तर कम होता जा रहा है। एक आदमी को अपने जीवन काल में 400 पौधे लगाने चाहिए, लेकिन बिल्डर हो या सोसाइटी के निवासी वह इन बातों से जागरूक नहीं है। हरियाली नहीं होने से वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा है।
धड़ल्ले से हो रहा खनन
शाहबेरी गांव में इमारत गिरी, यहां भी खुदाई का काम किया जा रहा था, लेकिन इसकी अनुमति किसी से नहीं ली गई थी। यह हाल सिर्फ शाहबेरी का नहीं, बल्कि दिन ढलते ही गांवों में मिट्टी काटने का काम धड़ल्ले से किया जा रहा है। रातों-रात सैकड़ों ट्रक मिट्टी एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाई जा रही है।
बिल्डर रुपये लेकर बड़ी इमारतें खड़ी करता जा रहा है, लेकिन यहां हरियाली शून्य है। कंस्ट्रक्शन बहुत ही निम्न स्तर का है। ऐसे में बड़ी इमारतों में खुदाई करना गलत है। शाहबेरी में इसी कारण बिल्डिंग भरभरा कर गिर गई।
- विक्रांत तोंगड़, पर्यावरण विद्