एम्स विस्तार : 755 बेड के अस्पताल
की पर्यावरण मंजूरी में खामियां
- केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने एनबीसीसी से मांगा जवाब
विवेक मिश्रा
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी में भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के विस्तार के तहत 755 बेड वाले अस्पताल को हाल ही में मिली पर्यावरण मंजूरी में कई खामियां सामने आई हैं। तमाम कमियों के बावजूद परियोजना प्रस्तावक राष्ट्रीय भवन निर्माण निगम (एनबीसीसी) को पर्यावरण मंजूरी जारी करने को लेकर आपत्तियां भी दर्ज कराई जा रही हैं। इन पर खुद जवाब देने के बजाय केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने एनबीसीसी से ही जल्द से जल्द जवाब देने को कहा है।
एम्स के प्रस्तावित विस्तार का काम एनबीसीसी के पास है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के डी श्रेणी वैज्ञानिक डॉ. विनोद कुमार सिंह ने हाल ही में एनबीसीसी को इस संबंध में पत्र लिखा है। इसमें पर्यावरण मंजूरी को लेकर की गई आपत्तियों पर जवाब देने को कहा है।
एनबीसीसी को भेजे गए खत में पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि गैरसरकारी संस्था चेतना की ओर से पर्यावरण मंजूरी पर सवाल उठाए गए हैं। मसलन, निर्माण के लिए पानी के वैध स्रोत और दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के जरिये पानी उपलब्ध कराने का प्रमाण-पत्र, बारापूला रोड पर ट्रैफिक जाम बढ़ने की आशंका, उसका समाधान या अध्ययन, पेड़ों की कटाई और भरपाई का आंकड़ा आदि बिंदुओं पर जवाब मांगा गया है।
गैर सरकारी संस्था चेतना का आरोप है कि एम्स अस्पताल के विस्तार को लेकर एनबीसीसी ने आधी-अधूरी जानकारी वाला प्रस्ताव केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के पास भेजा था। कई खामियों के बावजूद पर्यावरण मंजूरी निर्गत कर दी गई। इसके खिलाफ पर्यावरण मंत्रालय में शिकायत की गई थी। मंत्रालय से निर्गत पर्यावरण मंजूरी को वापस लेने की भी अपील की गई थी।
15 दिन में जवाब नहीं तो एनजीटी में उठेगा मामला
इस मामले में चेतना के अध्यक्ष अनिल सूद ने अमर उजाला से कहा कि एम्स का इलाका बेहद व्यस्त और संवेदनशील है। वायु और ध्वनि प्रदूषण के लिहाज से यहां पहले ही स्थिति खराब है। एम्स के विस्तार का इलाका किदवई नगर से जुड़ा हुआ है। किदवई नगर में सरकारी कॉलोनी के पुनर्विकास का मामला पहले से ही दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित है। ऐसे में एम्स के विस्तार का निर्णय बिना पर्यावरणीय क्षति के बिंदुओं पर विचार बिना ही लिया गया है। उन्होंने कहा कि 15 दिन के भीतर कोई मुकम्मल जवाब नहीं आता है तो यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में उठाया जाएगा।