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कर्मचारियों को दिया बढ़ा वेतन न वसूलें, न्यूनतम वेतन मुद्दे पर हाईकोर्ट का निर्देश

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हाईकोर्ट ने कर्मचारियों को बढ़ी हुई मजदूरी वापस न लेने का निर्देश नियोक्ताओं (मालिकों) को दिया है। हाईकोर्ट ने चार अगस्त को नियोक्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई के बाद दिल्ली सरकार के मार्च 2017 के आदेश को रद्द कर दिया था।

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कार्यवाहक मुख्य न्यायमूर्ति गीता मित्तल व न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर की खंडपीठ ने कहा कि जिन कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन अथवा मजदूरी दी गई है, उसे उन्हें वसूला न जाए। हाईकोर्ट ने इससे पहले दिल्ली सरकार का आदेश रद्द करते हुए कहा था कि यह निर्णय जल्दबाजी में उन नियोक्ताओं व कर्मचारियों से विमर्श किये बिना जारी किया था, जो उससे प्रभावित होने वाले थे।

खंडपीठ ने सितंबर 2016 की उस अधिसूचना को भी रद कर दिया था, जिसके अंतर्गत वेतन पुर्नअवलोकन कमेटी का गठन किया गया था। कोर्ट ने कहा था इस कमेटी का गठन पूरी तरह गलत था।
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हालांकि कोर्ट ने इस बात पर गौर किया था कि वेतन वृद्धि बिल्कुल जरूरी है, लेकिन जल्दबाजी व न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत की अवहेलना के कारण यह प्रयास बेकार हो गया। कोर्ट ने एलिस इन वंडरलैंड के किस्से का जिक्र करते हुए कहा था, जितना तेजी से हम दौड़ते हैं हम उतना ही पीछे हो जाते हैं।

कोर्ट ने दूसरी ओर यह भी स्पष्ट कर दिया था कि राजधानी में न्यूनतम वेतन निर्धारण को केवल इसलिए रद नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह पड़ोसी राज्य व शहरों से अधिक है।

कोर्ट के समक्ष नियोक्ताओं ने याचिका दायर कर कहा था कि दिल्ली सरकार का मार्च तीन 2017 का आदेश रद्द किया जाए, क्योंकि वेतन सलाहकार कमेटी ने अपनी सिफारिश देने से पहले उनसे इस मुद्दे पर विमर्श नहीं किया था।

गौरतलब है कि दिल्ली सरकार ने मार्च 2017 को अधिसूचना जारी कर अकुशल मजदूर के लिए न्यूनतम मजदूरी 9724 से बढ़ाकर 13350 रुपये प्रति माह व अर्द्धकुशल मजदूर की न्यूनतम मजदूरी 10764 रुपये से 14698 व कुशल मजदूर की मजदूरी 11830 से बढ़ाकर 16182 रुपये प्रतिमाह निर्धारित की थी।

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