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अपराजिता: चुनौतियों का सामना कर पाई शिक्षा, फिर गांव को शिक्षित किया

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पुरानी कहावत है कि यदि एक लड़के को शिक्षित करेंगे तो एक लड़का ही शिक्षित होगा, लेकिन यदि लड़की को शिक्षित करेंगे तो पूरा परिवार शिक्षित होगा। विमलेश शर्मा ऐसी ही एक महिला हैं जिन्हें कई चुनौतियों का सामना करने के बाद शिक्षा पाने का मौका मिला। उनकी शिक्षा गांव के लिए भी उपयोगी साबित हुई। विमलेश ने गांव में शिक्षा का प्रसार किया। साथ ही, महिला प्रधान बनकर नारी सशक्तिकरण के लिए भी संघर्ष किया।
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विमलेश के मुताबिक, उनका जन्म दिल्ली के एक गांव में हुआ था। माता-पिता ने समाज को दरकिनार कर उन्हें 11वीं तक शिक्षा दिलाई। इसका परिवार व गांव में जमकर विरोध हुआ तो उन्हें पढ़ाई रोकनी पड़ी। इस दौरान उन पर शादी का दबाव भी डाला गया। पढ़ाई छोड़कर साल भर तक घर बैठना उनके लिए बेहद दुखदायी था। उन्होंने पिता से कहा कि यदि उनकी शिक्षा दोबारा शुरू नहीं हुई तो बहुत मुश्किल होगी। इस पर पिता ने दोबारा उनका दाखिला कराया। जब वह स्नातक दूसरे वर्ष में थीं, उनकी शादी निठारी गांव में हो गई। 1978 में 19 साल की उम्र में ससुराल पहुंची तो नई चुनौतियों का दौर था। मायके की तरह ससुराल में भी शिक्षा पूरी करना आसान नहीं था। उस समय निठारी में लड़कियां कम ही स्कूल जाती थीं। गांव में हाई स्कूल भी नहीं था। ससुर शिक्षक थे और शिक्षा का महत्व समझते थे। उन्होंने स्नातक पूरी करने में सहयोग दिया। ससुर ने कहा कि वह गांव की सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी महिला हैं। यदि घर पर बैठकर सिर्फ घरेलू कार्य करेंगी तो शिक्षा का समुचित लाभ नहीं मिलेगा। उन्हें गांव के लिए कुछ करना चाहिए। ससुर के निर्देशन में विमलेश ने गांव में शिक्षा का प्रसार शुरू किया। खाली समय में वह गांव वालों को गीता व रामायण पढ़कर सुनाती थीं। 2003 में राजनीति से जुड़ीं और गांव के मुद्दों को कई मंचों पर उठाया। गांव में प्रधान की सीट जब महिला प्रत्याशी के लिए आरक्षित की गई तो वह चुनाव जीत गईं। विमलेश ने बताया कि उस समय आसपास के गांवों बरौला, हरौला, गिझोड़ में महिला प्रत्याशी चुनी गई थीं, लेकिन प्रधानों से संबंधित बैठकों में उनके पति ही जाते थे और सारे निर्णय वही लेते थे। यह कठपुतली प्रधान की भूमिका उन्हें पसंद नहीं थी। वह अपने सभी काम एवं निर्णय स्वयं करती थीं। इसका कई जगह विरोध भी हुआ, लेकिन वह नहीं बदलीं। उनके प्रयासों के फलस्वरूप वह भारतीय प्रधान संगठन की जिला अध्यक्ष भी बनीं। साथ ही, लड़कियों के उत्थान के लिए उनकी समाजसेवी संस्था भी लगातार कार्य कर रही है। अमर उजाला के अपराजिता अभियान के लिए उन्होंने कहा कि यह शहर से लेकर ग्रामीण महिलाओं तक के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।
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