मनमानी वसूली फिर भी खतरे में मासूमों की जिंदगी
गर्मियों की छुट्टियों का भी ट्रांसपोर्ट चार्ज लेते हैं निजी स्कूल
बसों में नहीं होते सुरक्षा के इंतजाम, सीबीएसई के दिशानिर्देशों का होता है उल्लंघन
अमर उजाला ब्यूरो
नोएडा। अभिभावक रोजमर्रा की चीजों में कटौती कर निजी स्कूलों में मोटी फीस देकर बच्चों को पढ़ा रहे हैं। ट्रांसपोर्ट के नाम पर भी अभिभावकाें की जेब काटी जा रही है। गर्मियों की छुट्टी में बच्चे घर में रहते हैं, फिर भी ट्रांसपोर्ट फीस देनी पड़ती है। बावजूद बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। सिर्फ बसों में ही नहीं स्कूलों में भी बच्चे सुरक्षित नहीं है। अभिभावक एसोसिएशन के अध्यक्ष यतेंद्र कसाना ने बताया कि स्कूल प्रबंधक बसों की जांच ठीक से नहीं करते हैं। बस में कोई स्टाफ नहीं होता है। ड्राइवर मन मुताबिक स्पीड में बस चलाते हैं। कोई बड़ा हादसा हो जाए तो कौन जिम्मेदार होगा। अभिभावक संघ स्कूल प्रबंधक से मिलने भी जाते हैं, लेकिन प्रिंसिपल मिलने तक को तैयार नहीं होते हैं।
खुद से बदल देते हैं ड्राइवर
अगर कभी बस ड्राइवर छुट्टी पर चला जाता है तो प्रबंधक इसकी जानकारी अभिभावकों को नहीं देते हैं। दूसरे ड्राइवर को बच्चों को लेने भेज देते हैं। अभिभावकों का कहना है कि उनका वेरिफिकेशन तक नहीं होता। ऐसे में हमारे बच्चे कैसे सुरक्षित रह सकते हैं। स्कूलों में चलने वाली बसें भी प्रबंधक हायर करते हैं। हादसा होने पर पल्ला झाड़ लेते हैं।
6 महीने में 150 स्कूली बसों के चालान
पिछले 6 महीनों में करीब 150 स्कूल बसों के चालान किए गए हैं। जांच में ड्राइवर चप्पल पहनकर बस चलाते मिले हैं। रेड लाइट जंप, वर्दी ना होना, फर्स्ट एड बॉक्स न जैसी कई शिकायतें मिलती हैं। सीबीएसई की गाइडलाइंस का उल्लंघन किया जा रहा है।
यह है दिशानिर्देश
बस में स्कूल स्टाफ होना चाहिए, सभी बच्चों को छोड़ने के बाद ही वो उतरें।
बस पीले रंग की होनी चाहिए, ताकि रोड पर सब को पता रहे कि ये स्कूल बस है।
बस पर स्कूल का नाम और फोन नंबर लिखा होना चाहिए।
बस पर रूट की पूरी जानकारी लिखी होनी चाहिए।
ड्राइवर वर्दी में होना चाहिए और निर्धारित से ज्यादा स्पीड नहीं होनी चाहिए।
फर्स्ट एड बॉक्स होना चाहिए।
बसों में आपातकालीन निकास होना चाहिए।
खिड़की मानकों के अनुसार होनी चाहिए। खिड़की ऐसी हो जिससे बच्चे का अंग बाहर नहीं निकलें।
बस चालक के पास पहचान पत्र हो।
आग बुझाने के उपकरण हो।
परिवहन विभाग समय समय पर स्कूली बसों का औचक निरीक्षण करता है। खामी मिलने पर चालान और सीज करने की प्रक्रिया की जाती है। स्कूलों को चेतावनी दी जाती है। खामियों को दूर कराने और सीबीएसई के मानकों के पालन को कहा जाता है।
हिमेश तिवारी, एआरटीओ प्रवर्तन
एपीजे की बस स्कूल प्रबंधक की नहीं थी। लीज पर बस ली गई थी। शहर के अधिकतर स्कूलों में यही हाल है। ऐसे में अगर कुछ होता है तो स्कूल पल्ला झाड़ लेते हैं। एसोसिएशन जिलाधिकारी से मिलेगी, ताकि स्कूलाें की मनमानी पर नकेल कसी जा सके। गर्मियों की छुट्टी के दौरान भी स्कूल ट्रांसपोर्ट चार्ज ले लेते हैं। बावजूद सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं करते हैं।
यतेंद्र कसाना, अध्यक्ष, ऑल नोएडा पैरेंट एसोसिएशन