शहर में आपराधिक घटनाओं का ग्राफ लगातार बढ़ता ही जा रहा है। बड़ी घटनाएं तो दूर पुलिस लूट, छिनैती, चोरी और छेड़छाड़ जैसी वारदातों पर लगाम लगाने में नाकाम साबित हो रही है और हो भी क्यों ना, जब किसी ने भी पुलिस सुधार की बात ही नहीं कही। लोकसभा चुनाव के दौरान किसी भी राजनीतिक दल ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। इस कारण अधिकारी भी इन घटनाओं को नजरअंदाज करते रहे। नतीजा अपराधियों के हौसले बुलंद हैं।
आम जनता अपनी शिकायतों के निस्तारण के लिए जनप्रतिनिधि या फिर स्थानीय पुलिस को प्राथमिकता देती है। इन दोनों विकल्पों के असफल होने के बाद ही वह उच्च स्तरीय कार्रवाई के आगे कदम बढ़ाता है। लेकिन यहां भी आम लोगों के साथ धोखा हुआ है। राजनीतिक दलों की बेरुखी से लोगों का बुरा हाल है। वहीं, पुलिस की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगता जा रहा है।
लोगों का कहना है कि किसी भी राजनीतिक दल द्वारा चुनाव के दौरान पुलिस सुधार की बात नहीं की गई। ऐसे में सिर्फ पुलिस महकमे को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है। सुरक्षित समाज और सुव्यवस्थित समाज की जिम्मेदारी सुदृढ़ पुलिसिंग की होती है तो वहीं सुदृढ़ पुलिसिंग की जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों पर होती है। लेकिन इस चुनाव में दोनों ही बातों पर किसी ने सोचा तक नहीं।