मेहता ने कहा था, दोषी फांसी से बचने के लिए जानबूझकर याचिका देने में देरी कर रहे हैं। रणनीति के तहत दया याचिका और सुधारात्मक याचिका दायर नहीं कर रहे। गुनहगार देश के सब्र का इम्तिहान ले रहे हैं और यह न्याय प्रणाली से खिलवाड़ है। उन्होंने कहा, जिन दोषियों के सभी कानूनी विकल्प खत्म हो गए हैं, उन्हें फांसी दी जा सकती है। ऐसा कोई नियम नहीं है कि चारों को फांसी एक साथ दी जाए।
मेहता की दलील पर हाईकोर्ट के जज सुरेश कुमार कैत ने पूछा, अगर दोषी चार हैं और दो के कानूनी विकल्प खत्म हो गए हैं और दो के बचे हुए हैं तो क्या होगा? मेहता ने कहा, ऐसे में इन्हें फांसी दी जा सकती है। वहीं, दोषियों की वकील रेबेका जॉन ने कहा, दोषियों को मौत की सजा एकसाथ दी गई, तो फांसी भी एकसाथ दी जानी चाहिए।
केंद्र दोषियों पर देरी का आरोप लगा रहा है, जबकि वह खुद इस मामले में महज दो दिन पहले जागा है। दरअसल, केंद्र सरकार ने पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा निर्भया के दोषियों की 1 फरवरी को तय की गई फांसी पर अगले आदेश तक रोक लगाने के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
इससे पहले मेहता ने कहा, सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब तक एक ही अपराध में सभी दोषियों की अपील पर फैसला नहीं हो जाता, फांसी नहीं हो सकती है। हालांकि, गुनहगारों की अपील खारिज होने के बाद अलग-अलग फांसी हो सकती है। एक बार सुप्रीम कोर्ट दोषियों पर अंतिम फैसला सुना देता है तो उन्हें अलग-अलग फांसी दिए जाने में कोई बाधा नहीं है।
सिर्फ एसएलपी लंबित होने पर ही टल सकती है फांसी
दिल्ली जेल नियमावली-2018 के मुताबिक, यदि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) आती है तो यही एक अंतिम कानूनी उपचार है जो फांसी टाल सकता है। अगर किसी एक अपराधी की एसएलपी लंबित हो तो बाकी के दोषियों की फांसी भी स्थगित हो जाएगी। निचली अदालत ने इसी को आधार बनाते हुए सभी दोषियों की फांसी स्थगित कर दी। मेहता ने कहा हालांकि, यह नियम दया याचिका के संबंध में लागू नहीं होता है।