अमूमन ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि बस चालान जैसे मामले की जांच में केंद्रीय गृह मंत्रालय खुद बीच में कूद पड़े। निर्भया के मामले में यही हुआ था। ट्रैफिक उल्लंघन के मामले में वह बस पकड़ी गई थी, मगर फिर भी दिल्ली की सड़कों पर सरपट दौड़ती रही।
बस को जब्त करने का मुख्य कारण निर्धारित रूट और जगह से सवारी बैठाने के नियम का उल्लंघन करना रहा। सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद वह बस चर्चा में आई। किसी एजेंसी के पास यह जवाब नहीं था कि बस को जब्त करने के बावजूद इसका परमिट रद्द क्यों नहीं किया गया।
सबसे लोकल पुलिस ने इस मामले की जांच पड़ताल की। फाइनल रिपोर्ट में कहा गया कि बस का मामला ट्रैफिक पुलिस के तहत आता है। यह अलग बात थी कि लोकल पुलिस भी बस संचालकों से मिलने वाली कथित घूस के हिस्से में शामिल थी। उन्होंने अपनी जांच में पूरी तरह से यह मामला ट्रैफिक पुलिस के सिर पर डाल दिया।
लोकल पुलिस ने इस बाबत अधिकार न होने की बात भी कह दी। यह कहा गया कि बस के परमिट को रद्द करने का अधिकार परिवहन विभाग के पास होता है। मामला ट्रैफिक पुलिस के पास पहुंचा, तो उसके अधिकारियों ने कहा, हमारा क्या कसूर है।
तत्कालीन संयुक्त पुलिस आयुक्त (ट्रैफिक) सत्येंद्र गर्ग ने कहा, जो विभाग बस का परमिट जारी करता है, उसे ही परमिट रद्द करने की पावर है। ट्रैफिक पुलिस ने उस बस का आठ बार चालान किया और छह बार जब्त किया। परिवहन विभाग ने मामले की जांच में कहा, हमारे पास इसका रिकार्ड नहीं था।
अब इस मामले की जांच शुरू हुई कि उस बस का परमिट रद्द क्यों नहीं हुआ। चालान होने के बाद साधारण जुर्माना अदा कर यह बस हमेशा छूट जाती थी, ऐसा कैसे संभव हुआ। इस मामले की जांच के लिए गृह मंत्रालय में तत्कालीन संयुक्त सचिव वीणा कुमारी मीणा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया।
इस समिति ने एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश की थी। मामले से जुड़े अन्य तथ्यों की जांच के अलावा कमेटी ने यह भी पता लगाया कि जब इस बस का कई बार चालान हो चुका था, तो वह दिल्ली की सड़कों पर किस तरह दौड़ती रही। बस का परमिट रद्द हो सकता था तो फिर क्यों नहीं किया गया।
इसके पीछे अफसरों का हाथ है या कोई कानूनी बाधा, इस बाबत गहराई से जांच की गई। दिल्ली पुलिस के तत्कालीन स्पेशल सीपी (लॉ एंड ऑर्डर) धमेंद्र कुमार ने ट्रैफिक पुलिस से चार्टर्ड बस के चालान से संबंधित रिकार्ड तलब किया था। उन्होंने भी परिवहन विभाग की लापरवाही मानी थी।
बाद में यह मामला आईएएस बनाम आईपीएस बन गया। दिल्ली के परिवहन विभाग में किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। लोकल पुलिस भी बच गई। ट्रैफिक पुलिस के तीन अफसर, सत्येंद्र गर्ग, डीसीपी प्रेमनाथ और एक अन्य महिला पुलिस अधिकारी को कई साल तक इस मामले में उलझा कर रखा गया।