उत्तराखंड में हरिद्वार जिले से लेकर उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले तक गंगा को स्वच्छ व निर्मल बनाने की मुहिम में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दोनों ही राज्यों को औद्योगिक अपशिष्ट और सीवेज शोधन व निस्तारण की मौजूदा स्थिति व उपायों को लेकर कई पहलुओं पर जवाब मांगा है।
एनजीटी ने कहा कि दो हफ्तों के भीतर दोनों ही राज्य जवाब दें। मामले की अगली सुनवाई 18 जनवरी को होगी।जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ गंगा सफाई को लेकर पर्यावरणविद व एडवोकेट एमसी मेहता के मामले की लगातार सुनवाई कर रहा है।
गोमुख से हरिद्वार तक आदेश के बाद अब हरिद्वार से कानपुर सीमा तक आदेश के लिए एनजीटी प्राधिकरणों से स्थिति और तथ्यों की मांग कर रहा है।
ग्रीन बेंच ने याची से भी औद्योगिक प्रदूषण की समस्या के समाधान को लेकर सुझाव मांगा है। एनजीटी ने दोनों ही राज्यों को निर्देश दिया है कि वे गंगा किनारे प्रदूषण फैलाने वाली इंडस्ट्री की पहचान करें।
ग्रीन बेंच ने कहा कि दोनों राज्य अगली सुनवाई में यह बताएं कि इन औद्योगिक इकाइयों से कितनी मात्रा में अपशिष्ट निकलता है और इनकी गुणवत्ता क्या है।
एनजीटी ने उत्तराखंड के शहरी विकास विभाग को निर्देश देते हुए कहा कि वह अगली सुनवाई में सूचित करे कि कितनी मात्रा में सीवेज या किसी भी प्रकार का डिस्चार्ज गंगा नदी में किया जा रहा है।
इसके अलावा ग्रीन बेंच ने अपने आदेश में कहा है कि उत्तराखंड से निकलकर उत्तर प्रदेश की सीमा में जहां गंगा नदी मिलती है उस बिंदु पर पानी की जांच की जाए।
जांच टीम में दोनों प्रदेशों की प्रदूषण नियंत्रण टीम और पर्यावरण मंत्रालय की ओर से प्रतिनिधि शामिल होंगे। वहीं ग्रीन बेंच ने दोनों ही राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को विश्लेषणात्मक रिपोर्ट भी पेश करने को कहा है।
ग्रीन पैनल ने हरिद्वार में औद्योगिक क्षेत्र और उत्तर प्रदेश में शुगर, पल्प, पेपर, टैनरी, ऑटो व अन्य औद्योगिक इकाइयों की स्थिति रिपोर्ट के साथ सरकार को अपना स्पष्ट पक्ष रखने के लिए कहा है।