एक के बाद एक चार बार के परिसीमन से बेशक दिल्ली के सियासी नक्शे में बड़ी तब्दीलियां आई हों, लेकिन नई दिल्ली संसदीय सीट अभी तक अटल है। 1952 के पहले चुनाव से लेकर मौजूदा संसदीय चुनाव तक इस सीट ने संसद में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।
दरअसल, पहले लोकसभा चुनाव में तीन सीटों के साथ दिल्ली में देश के सियासी नक्शे में जगह बनाई थी। इसमें नई दिल्ली के अलावा आउटर दिल्ली व दिल्ली सिटी सीट शामिल थीं। चौथे आम चुनाव में सीटों की संख्या सात हो गई। इस दौरान दिल्ली सिटी सीट खत्म कर दी गई।
वहीं, नई दिल्ली व आउटर दिल्ली मौजूद रही। जबकि चांदनी चौक, दिल्ली सदर को 1957 में अस्तित्व मिला। 1762 में करोल बाग का गठन हुआ। 1967 में पूर्वी दिल्ली व दक्षिणी दिल्ली के वजूद में आने के बाद दिल्ली में लोक सभा सीटों की संख्या सात हो गई।
इसके बाद से सीटों की संख्या हालांकि स्थिर है, लेकिन 2008 के परिसीमन के बाद इनके नामों व भौगोलिक क्षेत्रों में बड़ा बदलाव आया। नए परिसीमन से आउटर दिल्ली, दिल्ली सदर और करोल बाग सीट इतिहास में दर्ज हो गईं। इसकी जगह पश्चिमी दिल्ली, उत्तर-पश्चिमी दिल्ली व उत्तर पूर्वी दिल्ली सीट को अस्तित्व मिला। वहीं, हर लोक सभा का दायरा दस विधान सभाओं तक फैला दिया गया। सीटों के इस गुणा-गणित के बीच भी नई दिल्ली संसदीय सीट का वजूद बचा रहा।
नई दिल्ली को वीवीआईपी सीट को मिला है तमगा
नई दिल्ली संसदीय सीट को वीवीआईपी सीट का तमगा मिला हुआ है। इस सीट के अंदर राष्ट्रपति भवन से लेकर संसद, प्रधानमंत्री आवास, प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति भवन, संसद, इंडिया गेट, उच्चतम न्यायालय व विदेशी दूतावास जैसी अहम इमारतें हैं। वहीं, राष्ट्रीय भवन संग्रहालय, मुगल गार्डन जैसे दर्शनीय स्थल भी यही हैं। राजपथ की हर साल होने वाली गणतंत्र दिवस की परेड का गवाह भी यह सीट बनती है। दिल्ली का दिल कनॉट प्लेस इसी सीट का हिस्सा है।