आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने की घोषणा के साथ एनसीआर के लोगों की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं।
चूंकि दिल्ली और इन शहरों में रहने वालों का रोजमर्रा का नाता है। इसलिए कई ऐसी समस्याएं हैं जिनसे लोग ज्यादा प्रभावित हैं।
शीला सरकार में दिल्ली और एनसीआर के शहरों के बीच थ्री व्हीलर चलाने योजना बनी थी। लंबे समय तक माथा-पच्ची के बाद भी यह योजना सिरे नहीं चढ़ पाई।
अरविंद केजरीवाल का हरियाणा और इस सूबे के एनसीआर शहरों से गहरा नाता है। वाड्रा के खिलाफ अभियान की शुरुआत उन्होंने गुड़गांव से ही की थी।
अभी एनसीआर के शहरों में डीटीसी की बसें बहुत कम हैं। जो हैं भी तो रूट में सालों से कोई बदलाव नहीं हुआ है। जबकि पिछले दस वर्षों में गुड़गांव, फरीदाबाद, सोनीपत, पानीपत, रोहतक, रेवाड़ी का काफी विस्तार हुआ है।
इसके बावजूद दिल्ली से लगते इन शहरों में डीटीसी बसों की खास सुविधा नहीं है। आरोप यह भी है कि डीटीसी अपनी खटरा बसें गुड़गांव और फरीदाबाद के कुछ खास रूटों पर चलाकर मोटी कमाई करने में लगा है।
यह बात इससे भी साबित होती है कि इसकी एक भी बस आज हरियाणा के दो बड़े शहरों फरीदाबाद और गुड़गांव को नहीं जोड़तीं। जबकि दिल्ली की तकरीबन पांच विधानसभा क्षेत्रों की हदें हरियाणा के एनसीआर शहरों को छूती हैं।
फरीदाबाद का सूरजकुंड इलाका और गुड़गांव के कापसहेड़ा से लगता दिल्ली का इलाका इसके लिए काफी बदनाम है। आयानगर के लोग भी काफी हद तक गुड़गांव पर निर्भर हैं।
यही शिकायत बहादुरगढ़ वालों की है। दिल्ली से सस्ता पेट्रोल, डीजल व सीएनजी गुड़गांव में है। इसका लाभ उठाने के लिए दिल्ली वालों की एनसीआर के शहरों की सीमा पर स्थिति पंपों पर भीड़ लगी रहती है।
यहां की सस्ती शराब का भी दिल्ली वाले नाजायज लाभ उठा रहे हैं। इसके चलते दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों में शराब की तस्करी को बढ़ावा मिल रहा है।
दिल्ली की सीमा पर रहने वाले दिहाड़ी मजदूर गुड़गांव में रोटी कमाने बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। इनके कारण गुड़गांव सहित दूसरे सीमावर्ती शहरों के मजदूरों को नुक्सान हो रहा है।
उम्मीद की जा रही है कि दिल्ली के नए मुख्यमंत्री इस असंतुलन की ओर ध्यान देंगे। गुड़गांव उद्योग एसोसिएशन का कहना है कि इन समस्याओं से कुछ हद तक वैट के असंतुलन को दूर कर निपटा जा सकता है।