हाईकोर्ट ने 23 सप्ताह के भ्रूण का गर्भपात कराने की अनुमति संबंध में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को मेडिकल बोर्ड बनाकर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। इस याचिका में कहा गया है कि महिला के पेट में पल रहा भ्रूण कई गंभीर बीमारियों से ग्रसित है और पैदा होने के बाद उसकी कई सर्जरी करनी होंगी, जिससे उसकी जान बचने की संभावना भी कम होगी।
न्यायमूर्ति जेआर मिढा और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने याचिका पर संज्ञान लेते हुए एम्स को निर्देश दिया कि वह भ्रूण और उसकी मां की जांच के लिए मेडिकल बोर्ड का गठन करे। मेडिकल बोर्ड यह बताए कि क्या 23 सप्ताह के भ्रूण का गर्भपात किया जा सकता है। इसके साथ ही बच्चे की मेडिकल एबनॉर्मलिटी की जांच के भी निर्देश दिए गए हैं। पीठ ने कहा कि इस संबंध में 3 दिन के भीतर बंद लिफाफे में रिपोर्ट पेश की जाए ताकि मामले में और ज्यादा देर न हो।
कोर्ट के समक्ष याची के वकील विकास वालिया ने कहा कि उनकी मुव्वकिल महिला 29 वर्ष की है और यह उसका पहला गर्भ है। महिला और उसके पति को रूटीन जांच में डॉक्टरों ने बताया कि भ्रूण सामान्य नहीं है और इकोजेनिक बोवल और हैपेटिक कैल्सिफिकेशन नामक बीमारी से ग्रसित है।
दंपती अगर इस बच्चे को पैदा करते हैं तो उसकी बीमारियों के कारण बच्चे को काफी पीड़ा से गुजरना होगा। उसके पैदा होने के बाद उसकी कई सर्जरी करनी होंगी, लेकिन उसकी जान बचेगी या नहीं, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। डॉक्टरों ने भ्रूण 20 सप्ताह से ज्यादा का होने के कारण गर्भपात करने से इंकार कर दिया था।