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निर्भया के मां-बाप ने नम आंखों से बयां किया दर्द

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राजधानी में बिटिया को श्रद्धांजलि देने का दौर शुरू हो गया है। लेकिन, उसके अपने घर में सन्नाटा पसरा है। मां अपनी दुलारी को याद करते हुए बस आंखों से आंसू बहाती है। सिसकते हुए मां बस इतना ही कह पाती हैं... दुनियाभर में मेरी बच्ची को 16 दिसंबर को श्रद्धाजंलि दी जाएगी, पर हम तो वो भी नहीं कर सकते हैं।
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बिटिया के फोटो के आगे खड़े होने पर एक अपराध बोध होता है कि तीन सालों के बाद भी इंसाफ अधूरा है। जिस दरिंदे ने बेटी को सबसे अधिक दर्द दिया वो महज नाबालिग होने के चलते बाहर आ जाएगा। उसे सजा मिलती तो सही मायने में इंसाफ होता।

हर दिन नाबालिग के रिहाई की बातें सुनकर डर लग रहा है कि आखिर क्या सच में कानून उसकी उम्र के चलते उसके गुनाह की सजा नहीं दे पाएगा।

आलू के परांठे बनाऊंगी, ताकि वो जहां भी हो, उसका पेट भर सके

राजधानी की एक सोसायटी (परिवार पुराने घर से शिफ्ट हो चुका है) में अमर उजाला से विशेष बातचीत में मां ने बताया कि बुधवार को परिवार अपने पुराने घर जाएगा। मां कहती है कि हमें विश्वास है कि बिटिया कल हमसे मिलेगी। उस घर से उसकी बचपन की यादें हैं।

मां रोते हुए कहती है कि आम लोग तो फिर भी बेटी को याद कर लेते हैं, लेकिन सरकारी तंत्र तो भूल गया है। जब भी किसी बेटी के साथ रेप की बात सुनती हूं तो जख्म हरे हो जाते हैं। जीना है तो खाना तो पड़ेगा।

यूं तो उसे खाने में सब कुछ पसंद था, लेकिन 16 दिसंबर को खास आलू के परांठे बनाऊंगी, ताकि वो जहां भी हो, उसका पेट भर सके। उसे भूखा रहना पसंद नहीं था।
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सरकार ने घर और पैसा दे दिया है, लेकिन बदले में खुशियां छीन ली

पिता कहते हैं कि प्रधानमंत्री से लेकर मानवाधिकार आयोग तक नाबालिग के गुनाह की सजा दिलाने की बात कही, लेकिन हर कोई कानून में उम्र की बाधा की बात कहकर पल्ला झाड़ लेता है।

भाई कहते हैं कि राखी के दिन हमारी कलाई खाली होती है। दीदी होती तो शायद जिंदगी कुछ अलग होती। बेशक सरकार ने घर और पैसा दे दिया है, लेकिन बदले में खुशियां छीन ली है। दीदी के आगे हर चीज बेमानी है।

तीसरी बरसी पर जंतर-मंतर पर बिटिया के परिजन निर्भया चेतना दिवस के तहत श्रद्धाजंलि देंगे। बेटी के नाम पर ट्रस्ट खोला है, जहां वे बेटियों के अधिकारों के लिए कुछ नयी योजनाओं पर भी काम कर रहे हैं।
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