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मेट्रो ने बिगाड़ा रोडवेज का बजट, चार करोड़ का घाटा

Sun, 20 Mar 2016 09:21 AM IST
मुकेश शर्मा/अमर उजाला, फरीदाबाद
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मेट्रो - फोटो : अमर उजाला
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बल्लभगढ़ में शुरू हुए मेट्रो परिचालन ने रोडवेज का बजट बिगाड़ दिया है। वित्तीय घाटे से जूझ रहे रोडवेज को इस साल भी राहत नहीं मिली है। सिटी बस सेवा आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया साबित हो रही है। इस बस सेवा ने रोडवेज को करीब दो करोड़ 62 लाख 93 हजार फटका लगाया।
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हरियाणा रोडवेज फरवरी 2014-15 के दौरान एक करोड़ 36 लाख 68 हजार रुपये का नुकसान हुआ। उस दौरान रोडवेज 143 बसों का संचालन किया था। जिसके रखरखाव में रोडवेज को तीन करोड़ 88 लाख 43 हजार रुपये खर्च करने पड़े। इसी तरह सिटी बस सेवा से रोडवेज को दोगुना नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालत ये है कि 2015 तक एक करोड़ 10 लाख 39 हजार रुपये की बचत हुई। जबकि खर्च हुए तीन करोड़ 20 लाख 61 हजार रुपये।

अधिकारियों की मानें तो फरीदाबाद डिपो में इतस समय करीब 135 सामान्य बसें हैं। इनमें 105 बसें डीजल चालित हैं। जबकि 30 बसें सीएनजी चालित। डीजल चालित बसों में रोज करीब 8 हजार लीटर डीजल की खपत होती है। डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी से घाटा बढ़ता जा रहा है। अगस्त 2015 में हुई 45 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी से रोडवेज को रोज करीब 4 हजार रुपये का नुकसान हो रहा था। हाल ही में एक बार फिर डीजल की कीमत बढ़ गई है।
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मेट्रो खींच ले गई भीड
वाईएमसीए से दिल्ली तक मेट्रो सुविधा शुरू होने से हरियाणा रोडवेज की दिल्ली रूट की बसों में यात्रियों की संख्या लगातार घटती चली गई। खासकर सिटी बस सेवा के तहत चल रही एसी लो फ्लोर बसों में यात्रियों की संख्या में बेहद कमी आई है। दिल्ली रूट पर रोडवेज की रोज करीब 40 बसें चलती हैं। अब तक रोज करीब 2 हजार यात्री इस रूट की बसों में सफर करते थे। मेट्रो चलने के बाद करीब 400 से 500 यात्री रोडवेज बसों में कम हो गए हैं। मेट्रो को तवज्जो दिए जाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि मेट्रो में वातानूकुलित सफर दिल्ली तक का किराया मात्र 27 से 28 रुपये है जबकि रोडवेज की एसी वोल्वो बसों का किराया इससे दोगुने से भी ज्यादा है।

आदजमनी कुछ नहीं, खर्चा पूरा
रोडवेज को अधिक घाटा पुरानी बसें से हो रहा है। रोडवेज बेड़े में काफी समय से डीजल की नई बसें नहीं जुड़ी हैं। पुरानी बसें किलोमीटर पूरे करने के बाद सड़कों पर दौड़ रही हैं। इन्हें लंबे रुट पर चलने से यह बार-बार खराब हो जाती हैं। इन्हें वर्कशॉप लाने के बाद घाटा और बढ़ जाता है। बसें खराब होने की स्थिति में कई बार सवारियों को रास्ते में पैसे लौटाने पड़ते हैं। इसके चलते विभाग को पिछले एक साल में पुरानी बसों से 18 लाख रुपये का घाटा हुआ। छठें वेतन आयोग के चलते वेतनमान में वृद्धि हुई है। पुराना छह महीनों का बकाया भी देना पड़ा। पुरानी बसें लगातार धोखा दे रही हैं। इस कारण घाटा दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है।-जगवीर अहलावत, जीएम, सिटी बस सेवा सरकार रोडवेज को शुरूआत से ही घाटे का सौदा मान रही है। जबकि रोडवेज घाटे का नहीं फायदे का सौदा है। अधिकारियों के कुप्रबंधन और बसों के लगातार डिपो में खड़ा होने के कारण घाटा आ रहा है। जो बस चल रही है, उनसे फायदा हो रहा है।-रामआसरे, प्रदेश प्रवक्ता, हरियाणा रोडवेज वर्कर्स यूनियन
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