हाईकोर्ट ने मी-टू कैंपेन मामले में एक महिला पत्रकार को यौन उत्पीड़न संबंधी पोस्ट सोशल मीडिया से हटाने का निर्देश दिया है। साथ ही पीड़िता और आरोपी के सोशल मीडिया पर आगे इस संबंध में कुछ भी लिखने से भी मना किया है। महिला पत्रकार ने वेब पोर्टल के कुछ वरिष्ठ कर्मचारियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। उसने अपनी और आरोपियों की पहचान जाहिर कर दी थी।
मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन और न्यायमूर्ति वीके राव की खंडपीठ ने मामले में आरोपियों की याचिका पर सुनवाई के बाद यह रोक लगाई है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी पक्ष को इस मामले पर सोशल मीडिया और मीडिया में इंटरव्यू नहीं देना चाहिए। कोर्ट ने किसी तीसरे पक्ष पर भी इस मामले का प्रसारण करने या सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखने की रोक लगाई है।
वेब पोर्टल में काम करने वाली एक महिला पत्रकार ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर पिछले साल यौन शोषण का आरोप लगाया था। इस मामले में शिकायतकर्ता ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े एक्ट के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी थी। केंद्र और दिल्ली सरकार से भी कोर्ट ने इस मामले पर जवाब मांगा था। वेब पोर्टल की इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी (आईसीसी) ने महिला के आरोपों को खारिज कर दिया था।
पीड़िता ने आईसीसी के निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। महिला पत्रकार की शिकायत पर यह मामला कोर्ट में विचाराधीन है और कोर्ट ने सोशल मीडिया पर इस संबंध में लिखने पर रोक लगा रखी थी। महिला ने कोर्ट की रोक के बावजूद मी-टू कैंपन के तहत अपने मामले को सोशल मीडिया पर साझा कर दिया। कोर्ट ने 7 नवंबर 2017 को पोर्टल और मामले से जुड़े लोगों को आदेश दिए थे कि घटना से जुड़े सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखा जाए। पीड़िता और आरोपियों की पहचान उजागर न की जाए।