1987 में मेरठ के हाशिमपुरा दंगों के बाद 42 लोगों की पीएसी जवानों द्वारा हत्या के आरोप मामले में अदालत शनिवार को फैसला सुना सकती है। अदालत ने 21 फरवरी को 28 साल पुराने इस मामले में फैसला एक माह के लिए टाल दिया था। अदालत ने इस मामले में सबसे पहले 21 जनवरी को फैसला सुरक्षित रखा था।
थाना सिविल लाइन गाजियाबाद पुलिस ने इस मामले में पीएसी के 19 अधिकारियों व कर्मियों को आरोपी बनाया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मामले की सुनवाई दिल्ली ट्रांसफर हुई थी। तीस हजारी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजय जिंदल ने यूपी सरकार के विशेष अधिवक्ता सतीश टमटा, अतिरिक्त विशेष अधिवक्ता अकबर आबिदी और बचाव पक्ष के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद 21 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
अभियोजन के मुताबिक यह मामला पीएसी द्वारा ेिहरासत में हत्या का मामला है। पीएसी जवानों ने हाशिमपुरा इलाके से 22 मई 1987 को लोगों को अगवा किया और उसके बाद रात के अंधेरे में गोलियों से भूनकर शवों को गंगनहर व हिंडन नदी में फेंक दिया। इनमें से कुछ शव ही मिल पाए।
कंपनी कमांडर समेत तीन की हो चुकी है मौत
मेरठ के हाशिमपुरा व जुम्मनपुरा के 42 लोगों की हत्या से जुड़े इस मामले में पीएसी के 16 अधिकारी व कर्मी आरोपी हैं। पीएसी के कंपनी कमांडर सुरेंद्र पाल सिंह समेत तीन आरोपियों की मौत हो चुकी है। अभियोजन पक्ष ने जीवित बचे पांच पीड़ितों, मृतकों के परिजनों, डॉक्टरों व अन्य गवाहों, ट्रक की एफएसएल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पीएसी के जवानों ने हत्या की मंशा से पीड़ितों को अगवा किया।
गोलीबारी के बाद जिंदा बचे जुल्फिकार, मोहम्मद नईम, मोहम्मद उस्मान, मुजीबुर्रहमान, बाबुद्दीन के बयानों के हवाले से कहा गया कि एक समुदाय विशेष के लोगों को अगवा किया और गोली मारकर गंगनहर व हिंडन नदी में शवों को फेंक दिया। इनमें से पांच लोग जिंदा बच गए, जिनके बयानों के आधार पर गाजियाबाद पुलिस ने यह मामला दर्ज किया था। अदालत ने आरोपियों के खिलाफ दंगा, आपराधिक साजिश, हत्या, हत्या की मंशा से अपहरण, हत्या के प्रयास व साक्ष्य नष्ट करने संबंधी धाराओं में आरोप तय किए थे।