एमसीडी के अधिकारियों ने बताया कि योजना अभी प्रारंभिक चरण में है। जल्द ही इस पर परामर्श जारी होने की उम्मीद है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य कबूतरों की बीट से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को कम करना है। इसमें साल्मोनेला, ई कोलाई और इन्फ्लूएंजा जैसे रोगाणु होने का खतरा रहता है। ये अस्थमा जैसी श्वसन संबंधी बीमारियों को बढ़ा सकते हैं।
एक निजी अस्पताल के डॉ. उषास्त धीर ने कहा कि ट्रांसप्लांट रोगियों के लिए यह जोखिम जीवन के लिए खतरा हो सकता है। जब कबूतर बड़ी संख्या में इकट्ठा होते हैं, तो उनकी बीट और पंख फड़फड़ाना विभिन्न रोगजनकों, विशेष रूप से क्रिप्टोकोकोसिस जैसे फंगल के लिए प्रजनन स्थल बनाता है। इनमें हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस, अस्थमा और यहां तक कि मधुमेह जैसी स्थितियों वाले व्यक्तियों में गंभीर फंगल निमोनिया भी शामिल है।
वहीं, डॉक्टर डॉ. मीत घोनिया के अनुसार, कबूतरों के कारण हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस हो सकता है। इससे सामान्य लोगों के स्वस्थ फेफड़ों में सूजन और फाइब्रोसिस हो सकता है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में ओपीडी में कई मामले देख रहे हैं।