मौलाना यूसुफ, इमाम बंगले वाली मस्जिद, हजरत निजामुद्दीन ने कहा कि मीडिया ने इस पूरे मामले को बढ़ाया है। 21 मार्च को ही मरकज खाली करा लिया गया था। 22 मार्च को जो लोग रास्ते में थे, वे धीरे-धीरे मरकज में जुटते चले गए। ट्रेन 31 मार्च तक कैंसिल थीं। यहां भीड़ इकट्ठी होती गई। प्रधानमंत्री के लॉकडाउन के एलान के बाद लोग मरकज में फंस गए तो हम एसएचओ निजामुद्दीन के पास गए। एसएचओ ने जल्द से जल्द मरकज खाली कराने को कहा तो पुलिस से बसों का इंतजाम करने की मांग की गई। एसडीएम से बातचीत की गई तो उन्होंने सभी लोगों और वाहनों की लिस्ट मांगी।
यूसुफ ने कहा कि मरकज में दक्षिण भारतीय राज्यों के लोग भी मौजूद थे। एसडीएम ने कहा कि इतने सारे राज्यों में भेजने की अनुमति हम नहीं दे सकते। उनके पास फौरन कोई इंतजाम नहीं था। तब जिन लोगों को हल्का नजला, खांसी और बुखार था, उनको राजीव गांधी अस्पताल भेजा गया। इसके बाद दो सौ लोगों को दूसरे अस्पतालों में भेजा गया। इसी दौरान मीडिया को पता चल गया। हेल्थ डिपार्टमेंट ने कहा था कि हम इन लोगों के लिए यहां एक कैंप लगाकर जांच कर आगे भेजेंगे।
मौलाना यूसुफ ने कहा कि मरकज के आगे कैंप लगाकर जांच के बाद लोगों को अलग-अलग अस्पताल भेजा गया। तमिलनाडु वाले जिस साथी की मौत हुई है, वह भी एकदम ठीक था। मरकज ने अपने कदमों की जानकारी पुलिस व प्रशासन को लिखित में दी थी।
अमानतुल्लाह खान, विधायक ओखला विधानसभा क्षेत्र ने कहा कि 23 मार्च की रात 12 बजे मैंने पुलिस उपायुक्त दक्षिण-पूर्व आरपी मीणा और एसीपी निजामुद्दीन को बता दिया था कि निजामुद्दीन मरकज में 1000 से ज्यादा लोग फंसे हुए हैं। फिर पुलिस ने इनको सुरक्षित भेजने का इंतजाम क्यों नहीं किया।