पत्र में लिखा गया है कि शिक्षा की वर्तमान व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव करते हुए हमें बच्चों की 3 से 14 वर्ष की उम्र (नर्सरी से आठवीं कक्षा) का सही इस्तेमाल बच्चे में सीखने की बुनियादी क्षमता विकसित करने में करना होगा, ताकि बच्चा इसके आधार पर जीवन पर्यन्त सीखते समझते हुए जी सके। इस दौरान हमें विशेष प्रयास कर बच्चे के अंदर हैप्पीनेस माइंडसेट विकसित करने का लक्ष्य हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। उसके अंदर जिम्मेदारी से व्यवहार करने के गुण विकसित करना भी हमें इस अवस्था की शिक्षा के लक्ष्य में रखना चाहिए।
सिलेबस करें कम
सिसोदिया ने सुझाव दिया है कि हमें सिलेबस को थोड़ा कम करते हुए स्कूली शिक्षा को आगे जारी रखने पर जोर देने की बजाय, अब ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि हम साल दर साल सिलेबस पूरा किए जाने की अवधारणा से ही ऊपर उठ जाएं। इसके लिए स्कूलों को यह भूमिका देनी होगी कि वो इस उम्र के बच्चों के अंदर पढ़ने की, पढ़े हुए को समझने की, अपनी बात कहने की, लिखने की योग्यता विकसित करने की जिम्मेदारी लें। बच्चों के अंदर संख्या बोध विकसित करने, भाव और भावनाओं की समझ विकसित करने, स्वस्थ और स्वच्छ व्यवहार को अभ्यास में लाने का लक्ष्य जवाबदेही के साथ हासिल करने की जिम्मेदारी देनी चाहिए।
साल के अंत में परीक्षा के दबाव को करें खत्म
पत्र में सिसोदिया ने सेकेंडरी, सीनियर सेकेंडरी ग्रेड की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के ठोस सुझाव दिए हैं। उन्होंने लिखा है कि एनसीईआरटी और सीबीएससी को यह निर्देश दिए जाएं कि स्टूडेंट्स को सिलेबस आधारित रटंत-परीक्षा के चंगुल से मुक्त कराएं। एनसीईआरटी इन कक्षाओं के सभी विषयों के अपने सिलेबस में तीस फीसदी की कटौती तुरंत करें। शिक्षा में पाठ्यक्रम के वृहद दायरे से महत्वपूर्ण है, उन विषयों और मुद्दों को गहराई से समझने के अवसर। दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं को वर्ष के अंत में एक बड़ी परीक्षा के मॉडल से निकालकर कम सिलेबस के साथ निरंतर मूल्यांकन की प्रणाली यानि कंटीन्यूअस इवेलुएशन पर काम करें। इन कक्षाओं के छात्रों को समय-समय पर, जब वे तैयार हों और जब वह चाहें, उसके आधार पर उनकी परीक्षा ऑनलाइन ली जाने की व्यवस्था होनी चाहिए।
टीचर्स ट्रेनिंग के लिए भी दिए सुझाव
सिसोदिया ने टीचर्स ट्रेनिंग को भी नए नजरिए से देखने का सुझाव दिया है। उन्होंने लिखा है कि जब तक हमारे टीचर्स नए दौर की शिक्षा और परीक्षा के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होंगे, तब तक शिक्षा के क्षेत्र में कोई आधारभूत परिवर्तन नहीं होगा। हमे अपने टीचर्स को अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग देने के साथ साथ दुनिया में हो रहे आधुनिक प्रयोगों से भी रूबरू कराना होगा। ट्रेनिंग के अलावा रिसर्च पर भी हमे जोर देना होगा ताकि सीखने, सिखाने के नए तरीके स्कूलों के स्तर पर समझे और लागू किए जा सकें। टीचर ट्रेनिंग के लिए जहां हम सिंगापुर के मोडल से कुछ सीख सकते हैं, वहीं परीक्षा के लिए आई बी बोर्ड के तरीकों पर गौर किया जा सकता है।