कुछ दिनों बाद ताहिरा नाम की महिला से दूसरी शादी कर ली। नेरमा ने दूसरी शादी का विरोध करना शुरू कर दिया। झगड़े से तंग आकर फरीद ने 1990 में अपने कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर नेरमा की हत्या कर दी।
नागपुर पुलिस ने हत्या के मामले में उसे गिरफ्तार कर लिया। 1991 में अदालत ने इस मामले में उसे दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। वर्ष 1993 में वह पेरोल पर जेल से बाहर आया और फरार हो गया। भागने के बाद वह दिल्ली आकर कई जगहों पर रहा।