दिल्ली की विधानसभा भंग है लेकिन पूर्व विस अध्यक्ष एमएस धीर अपने पद पर अगले चुनाव तक बने रहेंगे। विस अध्यक्ष को पार्टी से हटकर देखा जाता है, उसके लिए कुछ मर्यादाएं और नियम बने हैं।
विस अध्यक्ष रहते हुए उन्हें संबंधित पार्टी के कार्यक्रम, मुख्यमंत्री या मंत्री कार्यालय में नहीं जाना चाहिए। विस के लिए बने नियमों को तोड़कर खुद से संबंधित पार्टी की हेल्प नहीं कर सकते। इन्हीं गरिमा और पाबंदी के कारण एमएस धीर का अरविंद केजरीवाल के साथ गणित बिगड़ गया।
सूत्र बताते हैं कि केजरीवाल की 49 दिन की सरकार का सबसे बड़ा वादा जनलोकपाल बिल पास कराना था। लेकिन बिल तैयार नहीं था और केजरीवाल उसे कार्यवाही की सूची में शामिल कराना चाहते थे।
कई बार इसके लिए जोर भी दिया गया। जब बिल पेश हुआ तब भी बिल देर रात विस को सौंपा गया। इतना ही नहीं बतौर मुख्यमंत्री और पार्टी का हाईकमान होने के नाते अरविंद विस अध्यक्ष को अपने कार्यालय व पार्टी के कार्यक्रमों में बुलाना चाहते थे।
लेकिन विस अध्यक्ष ने ऐसा करने से मना कर दिया था। इतना ही नहीं जब पहले दिन ‘आप’ के विधायक टोपी पहनकर आए तो टोपी उतारने और अगली बैठक में पहनकर नहीं आने की व्यवस्था दे दी थी।
दिल्ली विस के पूर्व सचिव एसके शर्मा का इस संबंध में कहना है कि विस अध्यक्ष रहते हुए संबंधित पार्टी के कार्यक्रम में शामिल नहीं होना चाहिए। न ही मुख्यमंत्री या मंत्री के कार्यालय में जाना चाहिए। हालांकि विस अध्यक्ष मुख्यमंत्री या मंत्री के घर पर जा सकते हैं।