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स्मृति शेष: दिल्ली के 'शेर' मदन लाल खुराना के बाद सत्ता में वापसी नहीं कर पाई भाजपा

Sun, 28 Oct 2018 01:14 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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मदन लाल खुराना (फाइल फोटो)
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मदन लाल खुराना दिल्ली के शेर के नाम से भी जाने जाते थे। खुराना दिल्ली में भाजपा के एकमात्र नेता ऐसे नेता रहे जिनके कारण दिल्ली में भाजपा को सत्ता मिली। खुराना के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए चुनावों में कभी भी भाजपा सत्ता में वापस नहीं आ पाई।

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वर्ष 1993 के चुनाव में भाजपा ने मदन लाल खुराना के नेतृत्व में भारी सफलता प्राप्त की और खुराना मुख्यमंत्री बने। जैन हवाला कांड मामले में उनका नाम आने पर खुराना को त्यागपत्र देना पड़ा और उनकी जगह तत्कालीन मंत्री साहिब सिंह वर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद खुराना को जेन वाला कांड में बरी कर दिया गया लेकिन उनको सत्ता वापस नहीं मिली इसके बाद हुए चुनावों में कुछ अरसे के लिए सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा।

मदन लाल खुराना इस बात से नाराज हुए। जब तक भाजपा संभलती तब तक भाजपा के हाथ से तुरुप का पत्ता निकल चुका था भाजपा आलाकमान ने उनको संतुष्ट करने के लिए राज्यपाल बनाया मेट्रो रेल में पद भी दिया, लेकिन इसके बाद भाजपा दिल्ली में सता से दूर रही।
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राजधानी में मदन लाल खुराना ही एकमात्र ऐसे नेता थे जिनकी दुकानदारों, व्यापारियों के अलावा हर समुदाय पर पकड़ रही। मोती नगर विधानसभा क्षेत्र में खुराना जी के रहते कभी कोई पार्टी कब्जा नहीं कर पाई। दिल्ली में उनके अलावा भाजपा में से कोई नेता नहीं हुआ जिसने सभी वर्गों में अपनी पहचान बनाई हो, यही कारण है कि उन्हें दिल्ली का शेर कहा जाता था। उनके विरोधी भी इस बात को मानते थे की खुराना जैसा नेता दिल्ली में भाजपा को कभी नहीं मिल पाया और वह भी उन्हें शेर दिल की के रूप में सम्मान देते थे।

फिलहाल खुराना के बेटे हरीश खुराना भाजपा में एक महत्वपूर्ण पद पर हैं और उनकी विरासत को संभाल रहे हैं। पिछले कई वर्षों से खुराना काफी बीमार चल रहे थे और बाद में कोमा में चले गए। वह भले ही कोमा में चले गए लेकिन प्रतिदिन उनका हाल-चाल जानने के लिए उनके शुभचिंतक घर पर जरूर पंहुचते थे। यही कारण है कि देर रात्रि को उनकी मृत्यु का समाचार मिलने के बाद भी उनके घर श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लग गया।

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मदनलाल खुराना ने दिल्ली में भाजपा को बुलंदी तक पहुंचाया

मदन लाल खुराना ने अपनी पढ़ाई इलाहाबाद के एविंग क्रिश्चियन कॉलेज और दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से की। मदन लाल खुराना ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की, जहां वे 1959 में छात्र संघ के महासचिव बने। इसके बाद वह 1960 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुषांगिक संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के मुख्य सचिव बने। उन्होंने दिल्ली में विजय मल्होत्रा, केदारनाथ साहनी और कंवरलाल गुप्ता के साथ जनसंघ के दिल्ली चैप्टर की स्थापना की, जो 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी। इससे पहले वह 1965 से 67 तक जन संघ के महासचिव रहे।

1984 में जब भाजपा की बुरी तरह से हार हुई तब राजधानी दिल्ली में फिर से पार्टी को खड़ा करने में खुराना का बड़ा हाथ था। दिल्ली बीजेपी में मदनलाल खुराना की गिनती कद्दावर नेताओं में होती थी। वह 1993 से लेकर 1996 तक (2 साल 96 दिन) दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे। केंद्र में जब पहली बार बीजेपी के नेतृत्व में सरकार बनी तो मदन लाल खुराना केंद्रीय मंत्री बने। हालांकि वाजपेयी सरकार के जाने के बाद उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया था। वर्ष 2004 में वह राजस्थान के राज्यपाल भी रहे। 

आडवाणी से पंगा, भाजपा में लगा रहा आना-जाना
2005 में उन्हें लालकृष्ण आडवाणी की आलोचना के कारण भाजपा से निकाल दिया गया, लेकिन 12 सितंबर को ही उन्हें फिर से पार्टी में वापस ले लिया गया। पार्टी विरोधी बयानों की वजह से उन्हें एक बार फिर 19 मार्च 2006 में पार्टी से निकाल दिया गया। वह 1965 से 67 तक जनसंघ के महासचिव भी रहे। राजनीति में कदम रखने से पहले वह शिक्षक थे। 2003 में विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने दिल्ली भाजपा प्रमुख पद से इस्तीफा दे दिया था। 

हवाला कांड में भी उछला था नाम 
वर्ष 1991 में हवाला कांड में भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ मदनलाल खुराना का नाम भी आया था। 

69वें संविधान संशोधन  के बाद पहले सीएम
69वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1991 लागू होने के बाद वह दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने। 
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