मदन लाल खुराना ने अपनी पढ़ाई इलाहाबाद के एविंग क्रिश्चियन कॉलेज और दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से की। मदन लाल खुराना ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की, जहां वे 1959 में छात्र संघ के महासचिव बने। इसके बाद वह 1960 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुषांगिक संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के मुख्य सचिव बने। उन्होंने दिल्ली में विजय मल्होत्रा, केदारनाथ साहनी और कंवरलाल गुप्ता के साथ जनसंघ के दिल्ली चैप्टर की स्थापना की, जो 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी। इससे पहले वह 1965 से 67 तक जन संघ के महासचिव रहे।
1984 में जब भाजपा की बुरी तरह से हार हुई तब राजधानी दिल्ली में फिर से पार्टी को खड़ा करने में खुराना का बड़ा हाथ था। दिल्ली बीजेपी में मदनलाल खुराना की गिनती कद्दावर नेताओं में होती थी। वह 1993 से लेकर 1996 तक (2 साल 96 दिन) दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे। केंद्र में जब पहली बार बीजेपी के नेतृत्व में सरकार बनी तो मदन लाल खुराना केंद्रीय मंत्री बने। हालांकि वाजपेयी सरकार के जाने के बाद उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया था। वर्ष 2004 में वह राजस्थान के राज्यपाल भी रहे।
आडवाणी से पंगा, भाजपा में लगा रहा आना-जाना
2005 में उन्हें लालकृष्ण आडवाणी की आलोचना के कारण भाजपा से निकाल दिया गया, लेकिन 12 सितंबर को ही उन्हें फिर से पार्टी में वापस ले लिया गया। पार्टी विरोधी बयानों की वजह से उन्हें एक बार फिर 19 मार्च 2006 में पार्टी से निकाल दिया गया। वह 1965 से 67 तक जनसंघ के महासचिव भी रहे। राजनीति में कदम रखने से पहले वह शिक्षक थे। 2003 में विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने दिल्ली भाजपा प्रमुख पद से इस्तीफा दे दिया था।
हवाला कांड में भी उछला था नाम
वर्ष 1991 में हवाला कांड में भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ मदनलाल खुराना का नाम भी आया था।
69वें संविधान संशोधन के बाद पहले सीएम
69वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1991 लागू होने के बाद वह दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने।