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मां तुझे प्रणाम: मैं तुझे हिंदुस्तान कहूं या कि अपनी पहचान कहूं...

Tue, 18 Aug 2020 06:26 AM IST
Vikas Kumar डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली
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अमर उजाला की ओर से आयोजित ऑनलाइन कवि सम्मेलन में प्रस्तुति देते डॉ. हरिओम पंवार और प्रो. अशोक चक्रधर। - फोटो : अमर उजाला
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‘जो सीने पर गोली खाने को आगे बढ़ जाते थे, भारत माता की जय कहकर फांसी पर चढ़ जाते थे। जिन बेटों ने धरती माता पर कुर्बानी दे डाली, आजादी के हवन-कुंड के लिए जवानी दे डाली...’ अमर उजाला के मां तुझे प्रणाम अभियान के अंतर्गत आयोजित काव्य कैफे में जब डॉ. हरिओम पंवार ने शहीदों को याद करते हुए यह पंक्तियां पढ़ीं तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो गए। अमर उजाला द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पिछले 17 वर्षों से ‘मां तुझे प्रणाम’ कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। इसी के अंतर्गत हर वर्ष कवि सम्मेलन भी आयोजित किया जाता है। कोरोना संक्रमण के चलते इस वर्ष यह पूरा आयोजन डिजिटल माध्यम से किया गया। 

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राष्ट्र भक्ति से ओत-प्रोत इस कवि सम्मेलन के सूत्रधार थे ख्यातनाम कवि अशोक चक्रधर और अध्यक्षता कर रहे थे डॉ हरिओम पंवार। अशोक चक्रधर ने शुरुआत में राष्ट्रीयआंदोलन के दौर के हिंदी के प्रसिद्ध कवियों  मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर और ‘हल्दीघाटी’ लिखने वाले श्यामनारायण पाण्डेय की काव्यात्मक चेतना को याद किया। इसके बाद कार्यक्रम की भूमिका बनाते हुए राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक तिरंगे झंडे के स्वरूप को बताने के लिए स्वरचित गीत की पंक्तियां ‘सारे वतन का प्यारा, नयनाभिराम सारा, संसार भर में ऊंचा, झंडा रहे हमारा...पढ़ी। युवा गीतकार प्रवीण कुमार पाण्डेय प्रज्ञार्थू ने ‘समर्पण है परवाने का, भ्रमर की प्रीत निराली है। स्वर्ग की उपमा या जीवित उपमान कहूं, मैं तुझे हिंदुस्तान कहूं या कि अपनी पहचान कहूं...के माध्यम से तालियां बटोरी।  

राष्ट्रीय चेतना के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर डॉ. राहुल अवस्थी ने देश की आज़ादी के मूल्यों को याद करते हुए एक से बढ़कर एक छंद पढ़े। उन्होंने ‘आंखों से बहा था नीर, नीर वो अमर है, पिय राह देखती थी हीर धर धीर पर। कह न सकी जो पीर, पीर वो अमर है...काव्यपाठ से समा बांध दिया। कवि सम्मेलन में ऑनलाइन दर्शक लगातार जुड़ते गए और आखिर तक बने रहे।  राहुल शर्मा अक्षत ने सबसे पहले छंद पढ़ा ‘युद्ध है समक्ष, तो विपक्ष और पक्ष के प्रत्येक दक्ष का भी धीर कक्ष डोलने लगा, देख दशा द्रौपदी की, वीर पुत्र पांडुओं की धमनियों में बूंद बूंद रक्त खौलने लगा, पांचजन्य की सुनी जो गूंज, ले भुजाओं में हरेक वीर अस्त्र और शस्त्र तोलने लगा’..।  
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इसके बाद अशोक चक्रधर ने कारगिल के शहीद विजयंत थापर की याद में ‘जब भी तिरंगे में लिपटा कोई ताबूत आया, टीवी ने उस समय बहुत रुलाया..कविता के जरिए माहौल को संवेदनशील कर दिया। राष्टवाद के महत्वपूर्ण कवि और कवि सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. हरिओम पंवार ने देश में भूख से होने वाली मौतों पर अफसोस जताते हुए और भूख से कोई न मरे इसके पक्ष में ‘मेरा गीत चांद है, ना चांदनी है आजकल, ना किसी के प्यार की ये रागिनी है आजकल। मेरा गीत हास्य भी नहीं है माफ़ कीजिये, साहित्य का भाष्य भी नहीं है माफ कीजिये...कविता पढ़ी। कार्यक्रम के अंत में सभी कवियों ने दर्शकों से ‘मां तुझे प्रणाम’ कार्यक्रम से जुड़ने की अपील की। ऑनलाइन काव्य कैफे में शामिल सभी प्रख्यात कवि अपने-अपने शहरों से ही डिजिटल माध्यम से जुड़े। डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक चले इस कवि सम्मेलन को आप किसी भी समय अमर उजाला के फेसबुक और यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं और शेयर भी कर सकते हैं।

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