दिल्ली में जिस वक्त भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना हजारे का आंदोलन था, दिलीप पांडेय हांगकांग की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहे थे। आंदोलन का प्रभाव दिलीप पांडेय पर भी पड़ा। वह सब-कुछ छोड़कर दिल्ली आ पहुंचे। आम आदमी पार्टी (आप) में अलग-अलग पदों पर काम किया और फिलहाल वह उत्तर पूर्वी दिल्ली से चुनावी मैदान में हैं। पेश है अमर उजाला संवाददाता संतोष कुमार साथ सियासी बातचीत के अंश...
सवाल: उत्तर पूर्वी दिल्ली का वोटर आपको वोट क्यों दे?
जवाब: बीते करीब एक साल से लोग देख रहे हैं कि मैं उन्हीं के बीच का, उनके हर सुख-दुख का साथी रहा हूं। लोगों की मांग पर दिल्ली सरकार से जुड़े कई काम करवाए हैं और जरूरत होने पर एमसीडी व केंद्र सरकार से लड़ाई भी लड़ी है। यह बात तबकी है, जब मैं उम्मीदवार भी नहीं था। जबकि काम की कौन कहे, मनोज तिवारी जैसे सेलीब्रिटी और शीला दीक्षित जैसी हाई प्रोफाइल सख्शियतों से मिलना ही नामुमकिन है। आज इस बात को हमारे अपने लोग बखूबी जानते/समझते भी हैं। और उन्हें यह भी पता है कि मेरी खुराक ही उन सबकी मुसकराहट है। इस बार का चुनाव बड़े आदमी बनाम आम आदमी का है, जिसमें आम आदमी का जीतना तय है।
सवाल: चुनाव प्रचार आखिरी चरण में है। इस वक्त आप अपना मुकाबला किससे देख रहे हैं? यह सीधा है या त्रिकोणीय?
जवाब: त्रिकोणीय मुकाबला कैसे? कांग्रेस को तो दिल्ली की जनता ने पांच साल पहले ही नकार दिया है। एक बार नहीं, चार-चार बार। तो आपके सवाल के जवाब के तौर पर सीधा मुकाबला भाजपा से है। लेकिन मैं इसे दूसरे तरह से देख रहा हूं। हकीकत में यह चुनाव मैं लड़ ही नहीं रहा हूं, इसे तो उत्तर-पूर्वी दिल्ली के लोगों ने इसे अपना चुनाव बना लिया है। और जब जनता ने चुनाव अपने हाथ में ले लिया तो वह मुकाम हासिल करेगा ही। आपको हैरानी होगी कि हमारे ऑफिस में खर्च होने वाला बिस्कुट, चाय, दूध, पानी, चद्दर, बिस्तर आदि रोजाना जरूरत की चीजें नहीं खरीदनी नहीं पड़ती। पिछले करीब छह महीने से अलग-अलग लोग रोजाना इसे पहुंचा जाते हैं। मैं किसी को हराने के लिए नहीं, खुद जीतने के लिए चुनाव लड़ रहा हूं।
सवाल: शीला दीक्षित बड़ा चेहरा हैं कांग्रेस की। प्रदेश अध्यक्ष भी है। डर में तो उनको नहीं नकार रहे हैं?
जवाब: एक बार जो फिल्म सिनेमा से उतर जाती है, उसका टिकट लेने कोई नहीं जाता। भले ही ब्लॉकबस्टर रही हो। तो चाहे जितना बड़ा चेहरा उतरा हो कांग्रेस से, उससे वोट का बंटवारा नहीं होने जा रहा है। लोग वोट का बंटवारा करके भाजपा को जिताने के मूड में कतई नहीं हैं। यही बात हम कांग्रेस का समझाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अफसोसजनक यह रहा कि जो बात जनता समझ गई, कांग्रेस उसे नहीं समझ सकी।
सवाल: और मनोज तिवारी, वह पूर्वांचल से ताल्लुक रखते हैं। उनकी अपनी फैन फालोइंग भी है। कितनी बड़ी चुनौती है उनसे?
जवाब: मनोज तिवारी पांच साल के सांसद भी हैं। बाकी सारी उपलब्धियों के साथ इस पैमाने पर भी कसना चाहिए उनको। हमारी छोड़िए, आप भाजपा के किसी वरिष्ठ नेता से बात कर लें तो वह मनोज तिवारी को कामकाज के लिहाज से शून्य अंक देगा। अगर उनके प्रर्दशन की तुलना बाकी दिल्ली के सांसदों से की जाए तो वह नीचे से पहले पायदान होंगे। इस वक्त वह सिग्नेचर ब्रिज, दिल्ली मेट्रो जैसे आप सरकार के कामों को अपनी रैलियों में अपना गिना रहे हैं।
सवाल: सांसद बनने के बाद आपकी प्राथमिकता क्या होगी?
जवाब: विकास के पैमाने पर उत्तर पूर्वी दिल्ली को बाकी दिल्ली के बराबर खड़ा करना। इसके लिए सबसे पहले सड़कों व गलियों का जाममुक्त करना है। फिर, नालों के किनारे जिंदगी गुजर कर रहे लोगों को बेहतर माहौल देना है। इसके अलावा अस्पताल व स्किल सेंटर खोलने हैं। इसका खाका हमने तैयार कर रखा है। लेकिन सबसे पहले दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाना है। जिससे दिल्ली की बेहतरी के लिए बनाई योजनाओं पर केंद्र सरकार अड़चन पैदा न कर सके।