दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव में एडी-चोटी का जोर लगाए उम्मीदवार और छात्र संगठन पसीने के साथ-साथ अपना पैसा भी खूब बहा रहे हैं। एक प्रत्याशी के लिए खर्च सीमा पांच हजार रुपये है, लेकिन खर्च लाखों-करोड़ों का होगा। पैसे खर्च करने की शुरुआत नामांकन से पहले ही हो चुकी है। हालांकि पानी की तरह पैसा बहाने के बावजूद बिल में खर्च पांच हजार रुपये ही दिखाया जाएगा। दरअसल, प्रत्याशियों के समर्थकों पर लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें लागू नहीं होती हैं।
डूसू से 52 कॉलेज जुड़े हैं। ये सभी अलग-अलग दिशाओं में हैं और एक-दूसरे से इनकी दूरी भी काफी अधिक है। वहां पहुंचने के लिए प्रत्याशी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों और एसयूवी का इस्तेमाल करते हैं। प्रचार के लिए हस्तलिखित पोस्टर, प्रिटेंड पोस्टर, फोन, ईमेल, व्हाट्स एप, ट्विटर का सहारा लेते हैं। इन सबके लिए किसी न किसी तरह पैसा बहाना पड़ता है। चुनाव में रुपये बहने की ही बानगी है कि कैंपस में ही कई जगह बड़े होर्डिंग्स लगे हैं।
प्रचार के लिए बड़ी गाड़ियों का इस्तेमाल शुरू हो गया है। कैलेंडर, डायरी, पैन बांटे जा रहे हैं। प्रचार के अंतिम समय में तो विद्यार्थियों को लुभाने के लिए फ्री मूवी टिकट और मनोरंजन पार्क की यात्रा कराने की भी योजना है। इस कारण यह चुनाव लाखों-करोड़ों का हो जाएगा। लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक चुनाव खर्च 5 हजार रुपये से ज्यादा नहीं हो सकता। छात्र संगठनों के मुताबिक, प्रत्याशी बनने के बाद हर उम्मीदवार का एक दिन का खर्च ही 20 हजार से ऊपर पहुंच जाता है।
समर्थकों के नाम पर खुलकर खर्च
समर्थकों पर खर्च सीमा लागू नहीं होती। इस कारण अतिरिक्त पैसा उन्हीं की जेब से खर्च होना दिखाया जाता है। संगठनों से जुड़े लोगों की मानें तो उम्मीदवारों के साथ उनके समर्थक ही पैसा खर्च करते हैं। चाहे वह खाने-पीने पर हो या विद्यार्थियों को लुभाने के लिए प्रचार पर। यह सब खर्च प्रत्याशी अपने चुनाव खर्च में शामिल नहीं करते। समर्थक जितना चाहे, प्रत्याशी के लिए खर्च कर सकता है।
व्यावहारिक नहीं है खर्च सीमा
एनएसयूआई के राष्ट्रीय मीडिया इंचार्ज नीरज मिश्रा कहते हैं कि लिंगदोह कमेटी ने सभी छात्र संघ चुनावों के लिए पांच हजार की खर्च सीमा तय की है। यह खर्च राशि दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों के लिए व्यावहारिक नहीं है। डूसू से 52 कॉलेज जुड़े हुए हैं। ऐसे में एक प्रत्याशी प्रचार के लिए कॉलेज भी घूमेगा तो परिवहन खर्च ही पांच हजार रुपये से अधिक होगा। फिर 2010 मेें जो खर्च सीमा थी, वह आज नौ साल भी उतनी ही है। महंगाई के कारण खर्च राशि भी बढ़नी चाहिए।