उपराज्यपाल ने दिल्ली की संवैधानिक व्यवस्था का विस्तार से जिक्र करते हुए कहा है कि मौजूदा चुनी हुई सरकार जानबूझकर नियमों का उल्लंघन करने की कोशिश कर रही है। वह संविधान और कानून के शासन की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।
उन्होंने कभी संविधान की भावना और उसके शब्दों को अनदेखा नहीं किया है। उन्होंने सिर्फ उन्हीं प्रस्तावों को सुधार के लिए वापस पास भेजा है, जो बिना प्रक्रिया के या अधूरे उनके पास भेजे गए।
बावजूद इसके चुनी हुई सरकार ने कई मामलों में उच्च न्यायालय के कई बड़े निर्णयों को बेकार साबित कर दिया है। मसलन, कमीशन आफ इन्क्वायरी के गठन की अधिसूचना, बिजली कंपनियों में नामित निदेशकों की नियुक्ति, न्यूनतम सर्कल रेट आदि।
उपराज्यपाल की तरफ से बताया गया कि उनके कार्यालय को लगभग दस हजार फाईल/प्रस्ताव प्राप्त हुये। इनका अनुमोदित करना था। इसमें से आरक्षित विषयों पर भी फाइलें/प्रस्ताव शामिल थे। इनमें से 97 फीसदी प्रस्तावों को बिना बदलाव के तुरंत मंजूरी दे दी गई।
केवल दो प्रस्तावों को ट्रांस्जक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स के तहत सलाह के लिए राष्ट्रपति को भेजा गया। जबकि तीन फीसदी से कम फाइलों को सरकार के पास स्पष्टीकरण या सुझाव के लिए वापस भेजा गया। उन तीन फीसदी में भी कई पर सहमति बनने के बाद मंजूरी दे दी गयी।