सितंबर 2015 में जर्नल ऑफ द एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडिया में एम्स सहित देश के सात विशेषज्ञों का अध्ययन एपी-एआईएम प्रकाशित हुआ था। इसके अनुसार अस्थमा प्रबंधन की भारत में स्थिति बेहद कमजोर है। अध्ययन में अजमेर, दिल्ली, कोलकाता, राउरकेला, मुंबई, चेन्नई, राजकोट में फरवरी से जुलाई के बीच मरीजों से सवाल जवाब किए गए थे। अध्ययन में एम्स निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया शामिल थे। एम्स में आने वाले अस्थमा रोगियों से बातचीत के बाद अस्थमा रोग होने के बाद बरती जाने वाली सतर्कता के बारे में जानकारी बहुत कम देखने को मिली।
उत्तर भारत में स्थिति और गंभीर
2017 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिसर्च इन मेडिकल साइंसेज में प्रकाशित राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज के अध्ययन में दिल्ली, यूपी, बिहार, हरियाणा, पंजाब सहित पूरे उत्तर भारत के अस्थमा और सीओपीडी मरीजों की गंभीर स्थिति बताई है। वरिष्ठ डॉ. मंदीप कुमार सोंधी के अनुसार 200 मरीजों पर किए गए इस अध्ययन में सामने आया कि 86 फीसदी मरीजों को इनहेलर के इस्तेमाल के बारे में नहीं पता। ठीक इसी तरह के अध्ययन हाल ही में ऑस्ट्रेलिया और यूके में भी हुए हैं। उन देशों में भी अस्थमा और सीओपीडी के रोगियों के हालात ऐसे ही हैं।
ये है देश की स्थिति
- हर 10 में से 1 अस्थमा मरीज भारत में
- 2 करोड़ के आसपास हैं देश में अस्थमा मरीज
- 2 करोड़ में 50 फीसदी अस्थमा मरीज बच्चे।
- 1.83 लाख से ज्यादा मरीजों की हर साल हो रही मौत।
- 90 फीसदी बच्चों और 50 फीसदी बड़ों में अस्थमा प्रदूषण से जुड़ा
- भारत में होने वाली मौतों में 12वां कारण है दमा यानि अस्थमा।