हरियाणा की राजनीति में निर्दलीय विधायकों की खास भूमिका रही है। हर विधानसभा चुनाव में निर्दलीय अच्छी संख्या में आते रहे हैं।
वह अधिकांश बार किंग मेकर साबित हुए हैं। इसीलिए इस बार भी श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री शिवचरण लाल शर्मा निर्दलीय चुनाव लड़ने का ही विचार कर रहे हैं।
निर्दलीय की वजह से ही इस समय वह मंत्री पद का सुख भोग रहे हैं। उनके परिवार में इस बात की राय बनाई जा रही है कि निर्दलीय विधायक रहेंगे तभी त्रिकोणीय मुकाबला होने या अन्य किसी स्थिति में पद की सौदेबाजी की जा सकेगी। पार्टी में रहकर ऐसा नहीं किया जा सकता।
पहली विधानसभा में निर्दलीयों ने किया था तख्तापलट
राजनीति के जानकार बताते हैं कि प्रदेश में पहली विधानसभा के गठन के बाद निर्दलीयों के सहारे सत्ता परिवर्तन भी हुआ था। इस समय के 16 निर्दलीयों ने 12 कांग्रेस विधायकों को अपने साथ मिलाकर मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा का तख्ता पलट कर दिया था।
इसी विधानसभा में निर्दलीय विधायकों ने राव वीरेंद्र सिंह की ताजपोशी करने की अहम भूमिका भी निभाई थी। इसमें से हसनपुर सुरक्षित (फरीदाबाद) सीट से जीतकर आए गयालाल ने तो 24 घंटे में चार बार अपनी निष्ठा बदलने का रिकार्ड कायम किया था।
पार्टी नहीं देती टिकट तो लड़ते हैं निर्दलीय चुनाव
यहीं से आयाराम-गयाराम की कहावत ने राजनीति की दुनिया में प्रवेश किया था। इसके बाद निर्दलीय विधायक लगातार सत्ता के साथ लग कर मलाई खाते रहे।
देखा यह गया है कि जनता अपना मत निर्दलीयों को सौंपकर उन्हें विजय दिलवाती है लेकिन चुनाव जीतने के बाद वही निर्दलीय विधायक उसी दल के पास चले जाते हैं, जिसके खिलाफ जनता वोट देती है।
अधिकतर निर्दलीय विभिन्न राजनीतिक दलों से ही संबंधित होते हैं लेकिन पार्टी जब उन्हें टिकट नहीं देती तो वह निर्दलीय मैदान में कूद जाते हैं। एनआईटी से विधायक शिवचरण लाल शर्मा ने कुछ ऐसा ही किया था। इस बार फिर कई दलों के बागी निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।