काली कमाई पर मोदी सरकार की चोट का सकारात्मक असर भले ही आने वाले समय में दिखाई दे, लेकिन फिलहाल इस फैसले का असर आम लोगों की रसोई के बजट पर पड़ता दिख रहा है। नोटों की तंगी ने घरों की अर्थव्यवस्था बिगाड़ दी है। इसका सबसे बड़ा असर श्रमिक वर्ग पर दिखाई दिया है।
औद्योगिक नगरी फरीदाबाद की इकाइयों में काम करने वाले हजारों श्रमिकों के सामने वेतन का संकट खड़ा हो गया है। यह हाल केवल फरीदाबाद ही नहीं, बल्कि एनसीआर सहित देश भर के उन सभी उद्योगों का है, जहां श्रमिकों को हर महीने नगद वेतन दिया जाता है।
फरीदाबाद में छोटे-बड़े 20 हजार से ज्यादा उद्योग हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, यहां 3.20 लाख श्रमिक हैं। साथ ही करीब 10 हजार करोड़ रुपये का पूंजी निवेश बताया जाता है। उद्योग जगत से जुड़े जानकारों की मानें, तो ऐसे श्रमिकों की संख्या एक लाख से ज्यादा है, जिनके बैंक अकाउंट नहीं हैं। इन्हें नगद वेतन दिया जाता है।
ऐसे श्रमिकों में अधिकांश 10 हजार से कम वेतन वाले हैं। सैलरी अकाउंट वाले कर्मचारियों के खाते में हर माह 1 से 7 तारीख के बीच वेतन पहुंच जाता है। इसके बाद नगद वेतन का सिलसिला 15 तारीख तक चलता है।
8 नवंबर की रात अचानक पीएम मोदी के एलान ने न केवल उन लोगों की नींद उड़ा दी, जो नगदी के रूप में धन दबाए बैठे हैं, बल्कि उन श्रमिकों के सामने भी समस्या खड़ी हो गई है, जो मकान का किराया, रसोई का सामान और बच्चों की फीस के लिए वेतन आने का इंतजार कर रहे थे।
सेक्टर-24 स्थित एक बड़ी कंपनी के अकाउंटेंट ने बताया कि महीने की 10 तारीख को तनख्वाह बांटी जाती है। बृहस्पतिवार को भी इसकी पूरी तैयारी थी, लेकिन 500 और 1000 रुपये के नोट लेने से अधिकांश कर्मचारियों ने इनकार कर दिया।
इसके बाद कंपनी प्रबंधन की तरफ से 10-15 दिन तक इंतजार करने का हवाला कर्मचारियों को दिया गया। एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करने वाली सिमी ने बताया कि हर महीने 8 तारीख को वेतन मिल जाता था, लेकिन इस बार 15 दिन का समय कंपनी प्रबंधन ने मांगा है।
फुटवियर कंपनी में काम करने वाले राकेश ने बताया कि 500 व 1000 रुपये के नोट की वजह से तनख्वाह नहीं मिली है। कंपनी प्रबंधन की तरफ से कर्मचारियों को तय तारीख भी नहीं दी गई है।