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केजरीवाल का एक और झूठ जिसने हाईकोर्ट को भी नहीं बख्शा

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कानूनी रूप से देखा जाए तो कोर्ट किसी भी ऐसे मामले में फैसला सुना नहीं सकती जिसका किसी भी संबंधित पक्ष ने दावा न किया हो। और इस केस में वादी या प्रतिवादी किसी ने भी गृहमंत्रालय के नोटिफिकेशन पर कोई राहत की मांग नहीं की थी।
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यानी यह बात साफ है कि अदालत ने गृहमंत्रालय के नोटिफिकेशन पर केजरीवाल सरकार को कोई राहत नहीं दी है और उसके नोटिफिकेशन में कही गई बातें यथावत बनी हुई हैं।

इस तरह यह भी साफ हो जाता है कि केजरीवाल ने एक बार फिर तथ्य को मरोड़कर पेश किया है और वह पूरी तरह गलत है।

कनॉट प्लेस से बोला था झूठ

दिल्ली सरकार के सौ दिन पूरे होने पर सरकार ने कनॉट प्लेस पर ओपन कैबिनेट मीटिंग बुलाई थी जिसमें जनता की भी भागीदारी थी। उसी बैठक में केजरीवाल ने सबके सामने दिल्ली हाईकोर्ट का ऑर्डर पढ़ा था।

केजरीवाल ने बताया था कि हाईकोर्ट ने नोटिफिकेशन में गृहमंत्रालय के उस बिंदु को जिसमें दिल्ली सरकार की एंटी-करप्शन पुलिस, केंद्र सरकार के कर्मियों के भ्रष्टाचार की जांच नहीं कर सकती खारिज कर दिया है।

इसके बाद सभी मीडिया संस्थाओं की तरफ से भी यही बताया गया कि हाईकोर्ट ने गृहमंत्रालय के नोटिफिकेशन के उस बिंदु को खारिज कर दिया है। लेकिन हाईकोर्ट ने अपनी सुनवाई में काफी अलग बात कही थी।

अभी नहीं सुना गया है केंद्र का पक्ष का पक्ष

इन्हीं कारणों से कोर्ट इस मामले में केवल यही फैसला सुनाने को बाध्य थी कि बेल होगी या नहीं। अदालत के संज्ञान में और कोई मुद्दा नहीं था।

जजमेंट के 34वें पैराग्राफ में अदालत ने कहा है कि उसका फैसला केवल बेल एप्लीकेशन को लेकर ही है। इस मामले की सुनवाई में केंद्र सरकार की किसी भी तरीके से हिस्सेदारी नहीं थी।

इस कारण केस में केंद्र सरकार का पक्ष भी नहीं सुना गया। यही वजह है कि बिना केंद्र सरकार का पक्ष सुने उसके नोटिफिकेशन के संवैधानिक पहलू पर फैसला सुनाया ही नहीं जा सकता है।

इसलिए कोर्ट के सुनाए फैसले पर जो बातें अपने आप से केजरीवाल ने मान ली हैं कि अदालत ने गृहमंत्रालय के ‌नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया है। ये सरासर गलत होगा क्योंकि अदालत ने अभी तक गृहमंत्रालय का पक्ष नहीं सुना है।
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गृहमंत्रालय के नोटिफिकेशन पर अदालत ने चर्चा ही नहीं की

इस तरह यहां कोई शंका नहीं रह जाती कि अदालत ने गृहमंत्रालय के नोटिफिकेशन के संवैधानिक पक्ष पर फैसला सुनाया हो या उसे रद्द किया हो।

एक बात जो और ध्यान देने की है वो ये कि जिस ‌नोटिफिकेशन पर इस मामले में चर्चा हुई वो 23 जुलाई 2014 में जारी किया गया था।

यह बात जजमेंट कॉपी के पैरा संख्या 16 में लिखी है। जबकि गृहमंत्रालय का ताजा न‌ोटिफिकेशन 21 मई 2015 को जारी हुआ है। इस ताजा नोटिफिकेशन का केवल रिफरेंस लिया गया था। ये बात जजमेंट के पैरा संख्या 66 में वर्णित है।
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