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कारगिल के शहीद: शहीद वीरेंद्र ने घायल होकर भी दुश्मनों को खदेड़ा, लहराया कारगिल में तिरंगा

Fri, 26 Jul 2019 08:46 AM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, फरीदाबाद
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शहीद वीरेंद्र सिंह - फोटो : अमर उजाला
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कारगिल युद्ध के दौरान 6 जुलाई 1999 को मस्को घाटी (कश्मीर) में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने के दौरान शहीद हुए गांव मोहना के फौजी वीरेंद्र सिंह की शहादत की बात करते ही उनके परिजनों की छाती गर्व से चौड़ी हो जाती है।

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21 साल की उम्र में देश के लिए बलिदान देने वाले वीरेंद्र सिंह क्षेत्र के युवाओं के लिए हमेशा प्रेरणा स्रोत रहेंगे। इन जैसे बहादुरों की बदौलत ही 26 जुलाई 1999 को कारगिल विजय हासिल हुई थी। 

गोली लगने के बाद भी नहीं हारी थी हिम्मत 
फरीदाबाद के गांव मोहना निवासी शहीद वीरेंद्र सिंह के बड़े भाई डॉ. हरप्रसाद अत्री ने बताया कि वीरेंद्र अक्तूबर 1998 में फौज में भर्ती हो गए थे। उन्हें जाट रेजिमेंट मिली थी। उनके प्रशिक्षण के अभी छह माह ही हुए थे कि कारगिल युद्ध छिड़ गया था। जाट रेजिमेंट में सिपाही वीरेंद्र सिंह जब कारगिल की लड़ाई के लिए गए तो उनकी उम्र केवल 21 साल थी।
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उनकी तैनाती मस्को घाटी में थी। आदेश मिलने पर 25 जवानों की टुकड़ी ने 5 जुलाई की रात 8 बजे पिलर नंबर 2 पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू कर दी। पहाड़ की चोटी पर बैठे पाकिस्तानी सेना व घुसपैठियों ने भारतीय जवानों को आता देख फायरिंग शुरू कर दी। इस दौरान एक गोली वीरेंद्र सिंह के पैर में आ लगी।

डॉ. हरप्रसाद के अनुसार, गोली लगने के बावजूद वीरेंद्र ने हिम्मत नहीं हारी। 6 जुलाई को तड़के करीब 4.45 बजे भारतीय जवानों और पाकिस्तानी सेना के बीच जमकर गोलीबारी हुई। वीरेंद्र ने कई पाकिस्तानी सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया। चोटी फतह करने के बाद जब उनके साथी गोली निकालने का प्रयास कर रहे थे तभी उनके पास एक गोला आकर गिरा, जिसकी चपेट में आकर वीरेंद्र शहीद हो गए। 

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अंतिम संस्कार के पांच दिन बाद बड़े भाई भी पहुंच गए थे मोर्चे पर

डॉ. अत्री बताते हैं कि उनके बड़े भाई शेर सिंह भी सैनिक रहे हैं। सेना की सिग्नल कोर से सेवानिवृत्त शेर सिंह कारगिल युद्ध के दौरान उनकी तैनाती पोखरण, जेसलमैर में थी। शहादत की खबर मिलने पर भाई को अंतिम विदाई देने के लिए सेना ने छुट्टी दी थी।

11 जुलाई 1999 को गांव में ही सैनिक सम्मान के साथ शहीद वीरेंद्र सिंह का अंतिम संस्कार किया था। भाई के अंतिम संस्कार के पांचवें दिन ही वह देश रक्षा के जज्बे के साथ लेह-लद्दाख रवाना हो गए थे। 26 जुलाई 1999 को जब पाकिस्तान ने घुटने टेके तब उन्होंने छोटे भाई के चित्र को सलामी दी। 

गांव में बनवाया शहीद स्मारक
गांव मोहना निवासी कारेलाल और केला देवी के घर में वीरेंद्र सिंह का जन्म 1 जनवरी 1978 को हुआ था। वह अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। हरियाणा सरकार ने इस जांबाज की शहादत पर गांव के राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल का नाम शहीद वीरेंद्र के नाम पर रखा। गांव में उनका शहीद स्मारक भी बनाया गया है। प्रत्येक वर्ष 11 जुलाई को शहीद वीरेंद्र का विदाई दिवस मनाया जाता है। कबड्डी के शौकीन वीरेंद्र की याद में कबड्डी प्रतियोगिता भी कराई जाती है।
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