डॉ. अत्री बताते हैं कि उनके बड़े भाई शेर सिंह भी सैनिक रहे हैं। सेना की सिग्नल कोर से सेवानिवृत्त शेर सिंह कारगिल युद्ध के दौरान उनकी तैनाती पोखरण, जेसलमैर में थी। शहादत की खबर मिलने पर भाई को अंतिम विदाई देने के लिए सेना ने छुट्टी दी थी।
11 जुलाई 1999 को गांव में ही सैनिक सम्मान के साथ शहीद वीरेंद्र सिंह का अंतिम संस्कार किया था। भाई के अंतिम संस्कार के पांचवें दिन ही वह देश रक्षा के जज्बे के साथ लेह-लद्दाख रवाना हो गए थे। 26 जुलाई 1999 को जब पाकिस्तान ने घुटने टेके तब उन्होंने छोटे भाई के चित्र को सलामी दी।
गांव में बनवाया शहीद स्मारक
गांव मोहना निवासी कारेलाल और केला देवी के घर में वीरेंद्र सिंह का जन्म 1 जनवरी 1978 को हुआ था। वह अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। हरियाणा सरकार ने इस जांबाज की शहादत पर गांव के राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल का नाम शहीद वीरेंद्र के नाम पर रखा। गांव में उनका शहीद स्मारक भी बनाया गया है। प्रत्येक वर्ष 11 जुलाई को शहीद वीरेंद्र का विदाई दिवस मनाया जाता है। कबड्डी के शौकीन वीरेंद्र की याद में कबड्डी प्रतियोगिता भी कराई जाती है।