गुड़गांव की ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच पतली सी सड़क पटौदी-फर्रूखनगर होते हुए झज्जर जाती है। लगभग 50 किलोमीटर की इस सड़क के दोनों तरफ हरेभरे खेत हैं।
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पानीपत बावल मार्ग का फ्लाईओवर आते ही झज्जर शहर शुरू हो जाता है। मेन रोड पर पुलिस और सेना की गाड़ियों के पास खड़े जवान हर आने जाने वाले को गौर से देखते हैं।
अब कोई रोकटोक नहीं है, लेकिन बस स्टैंड आते-आते अहसास होने लगता है कि 70 हजार जनसंख्या के इस छोटे से शहर में रविवार को नफरत की ऐसी आंधी चली जिसने बरसों के सद्भाव और विश्वास को तोड़कर रख दिया। इस आग को भड़काने में शहर की जाट धर्मशाला में मौजूद छोटूराम की मूर्ति का खंडित होना चिंगारी का काम कर गया।
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हम लोग ठीकठाक रहें ये जाटों को बर्दाश्त नहीं
जाट बहुल इस इलाके में 21 फरवरी को आगजनी और हिंसा हुई। सुरक्षा बलों की फायरिंग और उपद्रवियों के हमले में 13 लोगों की जान अकेले झज्जर में चली गई।
भीड़ ने रविवार को छावनी कॉलोनी पर हमला कर सैनी जाति के दो लोगों की जान ले ली। कॉलोनी में जिन लोगों के मकान जले उनमें एडवोकेट, प्रापर्टी डीलर और दुकानदार भी हैं।
रोड पर मौजूद दुकानों और गली के घरों को चुन-चुनकर जलाया गया। युवा वकील राजेश सैनी कहते हैं, उन्हें हमारे आगे बढ़ने से जलन है। हम लोग ठीकठाक रहें ये जाटों को बर्दाश्त नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने जाटों के ओबीसी आरक्षण को रद्द कर दिया है
हिंसा का बहाना कुछ भी हो सकता है, जैसे इस मामले में सांसद राजकुमार सैनी का जाट आरक्षण विरोधी बयान। सैनी ओबीसी में आते हैं और सुप्रीम कोर्ट ने जाटों के ओबीसी आरक्षण को रद्द कर दिया है।
जली हुई जाट धर्मशाला के पास मौजूद धर्मवीर सिंह जाट कहते हैं, मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई कर रहा हूं। आरक्षण मिलता तो अच्छी सरकारी नौकरी की सोच सकता था, पर अब तो वह नहीं मिलेगी।
बस स्टैंड के पास बाजार को जलाने में भी पंजाबियों के प्रति रोष दिखता है। भले ही इसमें असामाजिक तत्व शामिल हों।
सरकारी नौकरियां घटने से जाटों में असुरक्षा बढ़ी है
वहीं, जाट नेता कहते भी हैं, हम लोग ज्यादा से ज्यादा फौज में सिपाही ही भरती हो सकते हैं। सरकारी नौकरियां घटने से जाटों में तेजी से आर्थिक असुरक्षा बढ़ी है। वे खुद को कृषि से जोड़कर देखते हैं।
एक एकड़ जमीन से साल में 50 हजार रुपये से ज्यादा आमदनी नहीं होती और नौकरियां पुलिस में कांस्टेबल, छोटे शहरों में वकील, स्कूल टीचर, प्रापर्टी डीलर या स्पोर्ट्स कोटे की हैं। राज्य में जाट युवक साफ्टवेयर इंजीनियर, डॉक्टर या मैनेजमेंट प्रोफेशनल जैसी नौकरियों में कम ही हैं।
रोहतक या झज्जर का किराना बाजार, डेयरी, राइस शेलर ज्यादातर पंजाबी या वैश्य समुदाय के हाथ में है। ऐसे में जाट समुदाय खुद को कमजोर मानते हुए आरक्षण का असली हकदार मानने लगता है और यही शायद आंदोलन की वजह है जो बाद में हिंसक हो गया।